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प्रत्यभिज्ञाहृदयम् (आचार्य क्षेमराज - काश्मीर शैवदर्शन एवं जयदेव सिंह सान्वय हिन्दी भाष्य)

Pratyabhijnahridayam of Acharya Kshemaraja with Hindi Commentary

by आचार्य क्षेमराज

DevanagariHindipublished187 pages
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टिप्पणियां १३५ नित्योदित में आत्मचेतना का सदा आविर्भाव बना रहता है, कभी तिरो- भाव नहीं होता । आत्मा तो नित्योदित है ही, उसमें हमारी चेतना की स्थिति बराबर नहीं रहती । शक्तिसंकोच के सिद्ध होने पर हमारी चेतना की नित्योदित में स्थिति हो जाती है । १५८. ऊर्ध्वकुण्डलिनी—जब प्राण और अपान सुषुम्ना में प्रवेश करते हैं और कुण्डलिनी ऊपर को उठती है तो उसे ऊर्ध्वकुण्डलिनी कहते हैं । कुण्ड- लिनी एक विशेष शक्ति है जो मूलाधार में ३½ वलयों (लपेटों) में प्रसुप्तरूप से वर्तमान है । जब वह मंत्र अथवा ध्यान के द्वारा जाग्रत् होती है, १ ३/४ वलयों से सुषुम्नानाड़ी के भीतर से ऊपर की ओर उठती है, लम्बिका को पारकर ब्रह्मरन्ध्र तक पहुँचती है, तो वह ऊर्ध्वकुण्डलिनी कहलाती है और उसकी इस व्याप्ति को विकास या विष कहते हैं । जिह्वामूल के पास चार प्राण नाड़ियों के चतुष्पथ ( चौराहा ) को लम्बिका कहते हैं । दो नाड़ियां वे हैं जिनके द्वारा सभी जीवों में प्राण का प्रवाह होता है । तीसरी नाडी वह है जिसके द्वारा योगी मूलाधार से ऊर्ध्वकुण्डलिनी के द्वारा ब्रह्मरन्ध्र तक जाता है जैसा कि ऊपर वर्णन किया गया है। चौथी नाडी उन सिद्ध योगियों के लिए हैं जिनका प्राण-वायु बिना मूलाधार से होकर सीधे ब्रह्मरन्ध्र को चला जाता है । १५६. षष्ठवक्त्र—यहाँ वक्त्र का अर्थ अवयव है आँख, कान, नाक, मुख और पायु को पंचवक्त्र कहते हैं । मेढ्रकन्द को जो गुदा के मूल में है षष्ठवक्त्र ( छठाँ अवयव ) कहते है । १६०. अधः कुण्डलिनी—लम्बिका से मूलाधार में वर्तमान कुण्डलिनी के १ ३/४ वलय तक का क्षेत्र अधः कुण्डलिनी का है । प्राण का प्रवाह अधः कुण्डलिनी के द्वारा लम्बिका से मूलाधार की ओर होता है । इस दशा को संकोच या वह्नि कहते हैं । प्राण और अपान का मिलकर सुषुम्नाधाम के द्वारा मूलाधार तक आ जाने का नाम अधः कुण्डलिनी है । १६१. वह्नि-विष—वह्नि का अधःकुण्डलिनी से संबंध हैं और विष का ऊर्ध्वकुण्डलिनी से । अधः कुण्डलिनी में प्रवेश ( आवेश ) संकोच अथवा वह्नि कहलाता है। ऊर्ध्वकुण्डलिनी में उठना विकास अथवा विष कहलता है । वह्नि का प्राण वायु से सम्बन्ध है और विष का अपान वायु से । जब प्राण सुषुम्ना में प्रवेश करता है और अधःकुण्डलिनी अथवा मूलाधार तक जाता है तब इस दशा को वह्नि कहते हैं। अधःकुण्डलिनी के मूल और आधे मध्य तक में प्रवेश वह्नि अथवा संकोच कहलाता है । वह्नि शब्द वह धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है ‘ले चलना, ले जाना’ । अग्नि को वह्नि इसलिए कहते हैं क्योंकि वह जो कुछ उसमें हवन किया जाता है उसे देवों त कले

४. चतुर्थ भाग (सूत्र १७-२०): शिव-समापत्ति, चिदानन्द-लाभ एवं ग्रन्थ-उपसंहार

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१३६ प्रत्यभिज्ञाहृदय जाती है। इस दशा में प्राण का मूलाधार तक वहन होता है (अर्थात् जाता है)। इसलिए उसे वह्नि कहते हैं। अधःकुण्डलिनी के मध्य के शेष अर्धभाग और उसके पूर्ण अग्रभाग से लेकर ऊर्ध्वकुण्डलिनी तक में आवेश अथवा प्रवेश विष कहलाता है। इस प्रसंग में विष शब्द का अर्थ जहर नहीं है। विष शब्द विष् धातु से निष्पन्न हुआ है जिसका अर्थ है 'व्याप्त होना, फैल जाना'। अतः विष का अर्थ है प्रसर या विकास। जहर को विष इसलिए कहते हैं क्योंकि वह सारे शरीर में व्याप्त हो जाता है। 'वह्नि और विष के मध्य में चित्त को फेंकना चाहिए'-यह कहने का तात्पर्य यही है कि जब प्राण और अपान सुषुम्ना में प्रवेश करते हैं तब चित्त को वह्नि और विष के बीच में अर्थात् अधः कुण्ड- लिनी और ऊर्ध्वकुण्डलिनी के बीच में निरुद्ध कर देना चाहिए। निरुद्ध कर देने का तात्पर्य यह है कि वहीं उसे रोक देना चाहिए। १६२. स्मरानन्द—इस प्रकार जब चित्त अधः और ऊर्ध्वकुण्डलिनी के बीच में निरुद्ध किया जाता है तब मैथुन के आनन्द की अनुभूति होती है। यह परावृत्त कामानन्द है। मैथुन का संगम बाह्य है, यह संगम आन्तरिक है। १६३. इस स्थान पर इस सम्प्रदाय की यौगिक क्रिया का वर्णन है। मध्य के विकास से ही सिद्धि होती है। अणु अर्थात् जीव के लिए इसका अर्थ है सुषुम्ना में जो कि ईडा और पिंगला नाड़ियों के मध्य में है—प्राणशक्ति का विकास। मध्य की सिद्धि का एक उपाय है शक्ति का संकोच और विकास। संकोच और विकास के शाब्दिक अर्थ से इस यौगिक क्रिया का भाव नहीं व्यक्त हो सकता। यहां पर संकोच का निम्नलिखित तात्पर्य है : जब इन्द्रियों के द्वारा चित्त विषयों की ओर उन्मुख होता है, जब इन्द्रियां रूप, शब्द, गन्ध इत्यादि के ग्रहण में लगी होती हैं, तब चित्त को उनकी ओर से खींच कर भीतर की ओर उस आत्मतत्त्व की ओर लगा देना चाहिए जो कि सभी कार्यों का उद्भव और अधिष्ठान है। विकास का अर्थ है इन्द्रियों के बाहर खुले रहने पर भी भीतर की ओर लक्ष्य रखना अर्थात् भैरवी मुद्रा का अभ्यास। संकोच का भाव है बाह्य विषयों से प्रत्याहार। विकास का भाव इन्द्रियों के विषयों के प्रति उन्मुख रहने पर भी आन्तरिक चेतना पर ध्यान। संकोच और विकास का और अधिक संवर्धन किया जाता है ऊर्ध्वकुण्डलिनी के स्तर पर प्रसर-विश्रान्ति द्वारा। इस सन्दर्भ में प्रसर को विकास का और विश्रान्ति को संकोच का पर्याय समझना चाहिए। योगी सुषुम्ना में प्राणशक्ति का विकास करता है और भ्रूमध्य में उसका निरोध कर ऊर्ध्वकुण्डलिनी के

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टिप्पणियाँ १३७ स्तर पर पहुँचता है। यहाँ वह प्रसर-विश्रान्ति का अभ्यास करता है। संकोच- विकास का संवर्धन अधःकुण्डलिनी में भी करना पड़ता है। अधःकुण्डलिनी के मूल और मध्य के अर्धभाग में अनुप्रवेश संकोच अथवा वह्नि कहलाता है और अधःकुण्डलिनी के शेष अर्धभाग और अग्रभाग में वहाँ तक अनुप्रवेश जहां कि ऊर्ध्वकुण्डलिनी का पर्यवसान होता है विकास अथवा विष अथवा उन्मीलन समाधि कहलाता है। १६४. अनच्क—अच् = अ, इ, उ, ऋ, लृ, ए, ओ, ऐ, औ = अर्थात् सभी स्वर। अनच्क का तात्पर्य है ककार, हकार इत्यादि का बिना स्वर के उच्चारण करना (क् ह्)। अनच्क उच्चारण का मुख्य भाव है किसी मंत्र पर ध्यान करते हुए उसके उद्गम तक पहुँच जाना जहाँ वह उच्चारणरहित है। १६५. प्राण हृदय से प्रारम्भ होता है और द्वादशान्त पर समाप्त होता है अर्थात् हृदय से बारह अंगुल के अन्त पर समाप्त होता है। हृदय से यहाँ तात्पर्य है 'उरः प्राचीर (डायफ्राम) का मध्य बिन्दु'। निभालन का तात्पर्य है चित्त का हृदय से प्राण के प्रारम्भ होने और द्वादशान्त पर समाप्त होने पर और अपान के द्वादशान्त पर प्रारम्भ होने और हृदय पर समाप्त होने पर लगाना। प्राण के उठने और ठहरने पर और इसी प्रकार अपान के उठने और ठहरने पर चित्त को लगाये रखना निभालन कहलाता है। यह बौद्धयोग के प्राणापान-स्मृति (पानापानसति) के समान है। यह 'शक्ति-द्वादशान्त या कौण्डली' कहलाता है। एक दूसरा द्वादशान्त ब्रह्मरन्ध्र के ऊपर है जिसे 'शिव-द्वादशान्त या प्रक्रियान्त' कहते हैं। १६६. सुभगे (सुन्दरि) यह देवी को सम्बोधन करके कहा गया हैं। इस दर्शन में बहुत सी रहस्य की बातें शिव और देवी के संवाद के रूप में कही गयी है। १६७. उन्मेष का शब्दार्थ है खिलना, विकास। यह शैवागमयोग का एक पारिभाषिक शब्द है। इस ग्रन्थ में उन्मेषसम्बन्धी श्लोक की केवल एक पंक्ति दी हुई है। पूरा श्लोक इस प्रकार है :— एकचिन्ताप्रसक्तस्य यतः स्यादपरोदयः । उन्मेषः स तु विज्ञेयः स्वयं तमुपलक्षयेत् ॥ इसका अर्थ निम्नलिखित है। जब कोई एक विचार में लगा हुआ है और दूसरे विचार का उदय होता है तब दोनों विचारों के सन्धिविन्दु के संवेदन को उन्मेष समझना चाहिए। इसको कोई स्वयं देख ले अर्थात् अनुभव कर ले।

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१३८ प्रत्यभिज्ञाहृदय चित्त का स्वभाव है एक विचार से दूसरे विचार की ओर क्रम से चलते रहना, किन्तु यदि कोई एक विचार के समाप्त होते ही और दूसरे विचार के उदय होने के ठीक पूर्व चित्तवृत्ति को विश्रान्त कर ले, तो वह उन्मेष भाव को प्राप्त कर सकता है। इसका भाव है दो विचारों या विकल्पों के बीच में जो संविद का स्पन्द है उसमें विश्रान्त होना अर्थात् दोनों विचारों का जो आधार या अधिष्ठान है उसमें ठहर जाना । उन्मेष की यह व्याख्या शाक्तोपाय दृष्टि से है। शाम्भवोपाय की दृष्टि से अपने अभीष्ट ध्येय पर ध्याने करते करते पारमार्थिक भाव का उदय होना 'उन्मेष' कहलाता है। १६८. इन श्लोकों में, रसानुभूति पर ध्यान करने के द्वारा परमानन्द के स्वरूप की अनुभूति के लिए तीन उपाय बतलाते गये हैं। (१) आस्वादधारणा : खान-पान के आस्वाद के मूल पर ध्यान करना । (२) शब्दधारणा-संगीत से प्राप्त आनन्द के मूल पर ध्यान करना । (३) मनस्तुष्टिधारणा—जिस किसी वस्तु से मन को प्रसन्नता होती है उसके मूल पर ध्यान करना । १६६. समावेश को समझने के लिए अभिनवगुप्त के तंत्रालोक के प्रथम आह्निक के २०५ पृष्ठ को देखें । वह इस प्रकार है :— आवेशश्चास्वतन्त्रस्य, स्वतद्रूपनिमज्जनात् । परतद्रूपता शम्भो- राद्याच्छक्त्यविभागिनः ( १.१७३ ) “आवेश ( समावेश ) का अर्थ है स्वातंत्र्यरहित परमित प्रमाता का अपने संकुचित रूप को डुबोकर अर्थात् नगण्य बनाकर स्वतंत्र चैतन्य अर्थात् परमशिव के साथ तादात्म्य कर लेना जो कि आद्या शक्ति से अभिन्न है। समावेश का भाव है अपने संकुचित रूप को विगलित कर परम शिव के रूप को ग्रहण कर लेना जो कि आत्मा का वास्तविक स्वरूप है । १७०. निमीलन समाधि—यह आँख मूंद कर ध्यान करने पर आन्तरिक समाधि की वह दशा है जिसमें व्यक्तिगत चेतना (चित्त ) सर्वव्यापी चेतना (चित्) में विलीन कर दी जाती है। इसमें वेद्य या ज्ञेय नहीं रह जाता । उसका चित् के साथ ऐक्य हो जाता है। यह वास्तविक अन्तर्मुखता है और पूर्णाहन्ता की अनुभूति का मार्ग है । १७१. व्युत्थान—इसका शब्दार्थ है उठना । योग में इसका अर्थ है ध्यान के अनन्तर सामान्य चेतना की स्थिति में आना ।

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देखिए टिप्पणी सं. १७४ अभिनवगुप्त के अनुसार कला और भुवनों का रेखाचित्र KALĀS AND BHUVANAS ACCORDING TO ABHINAVA-GUPTA 5. ŚĀNTĀTĪTĀ 4. ŚĀNTĀ KALĀ 3. VIDYĀ KALĀ 2. PRATIṢṬHĀ KALĀ

  1. NIVṚTTI KALĀ / १. निवृत्ति कला २. प्रतिष्ठा कला ३. विद्या कला ४. शान्ता कला ५. शान्तातीता EXPLANATORY NOTE ON THE DIAGRAM रेखाचित्र का स्पष्टीकरण समस्त विश्व पाँच कलाओं में विभक्त है । १. निवृत्ति कला — यह निम्नतम कला है। यह मुख्यतः पृथ्वीतत्त्व की बनी हुई है। इसके अन्तर्गत १६ भुवन हैं। निवृत्तिकला का निम्नतम भुवन 'कालाग्निरुद्र भुवन' कहलाता है। इसी का क्षेमराज ने 'कालाग्न्यादेः' में उल्लेख किया है। २. प्रतिष्ठा कला—निवृत्तिकला के बाद यह दूसरी कला है। इसमें जल तत्त्व से लेकर प्रकृतितत्त्व तक २३ तत्त्व हैं और ५६ भुवन हैं। ३. विद्या कला—यह तीसरी कला है। इसमें पुरुषतत्त्व से लेकर मायातत्त्व तक सात तत्त्व हैं और २८ भुवन हैं। ४. शान्ता कला—यह चौथी कला है। इसमें तीन तत्त्व हैं—शुद्धविद्या, ईश्वर और सदाशिव, और १८ भुवन हैं। ५. शान्तातीता कला—यह पाँचवीं कला है। इसमें केवल शिव और शक्ति तत्त्व हैं और कोई भुवन नहीं है। परमशिव तो सब कलाओं से अतीत है। भुवनों की कुल संख्या १६ + ५६ + २८ + १८ = ११८ है।
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टिप्पणियाँ १३६ १७२. क्रममुद्रा—इसकी दूसरी संज्ञा मुद्राक्रम भी है। इसका भाव ग्रन्थ में ही क्रमसूत्र में बतला दिया गया है। इसमें चित्त क्रम से बाहर से भीतर और भीतर से बाहर की ओर झूलता रहता हैं। ‘आभ्यन्तर’ सर्वव्यापी चेतना या शिव प्रतीत होता रहता है और ‘बाह्य’ भी इस दशा में एक भिन्न जगत् नहीं किन्तु सर्वव्यापी चेतना या शिवरूप प्रतीत होने लगता है। इस सन्दर्भ में ‘मुद्रा’ शब्द अवयवों और अंगुलियों के एक विशेष विन्यास या संस्थान के अर्थ में नहीं प्रयुक्त हुआ है। जिस अर्थ में उसका यहाँ प्रयोग हुआ है वह ग्रंथ में ही आगे दिया हुआ है। १७३. पराभट्टारिका रूपा अहन्ता। यह पूर्ण अहन्ता है। परा अहन्ता कहने का तात्पर्य है परमोत्कृष्ट विमर्श। विमर्श अर्थात् अहंबोध तीन प्रकार का है—पर, अपर और परापर। पर विमर्श शिव का है जिसमें पूर्ण अभेद है, मैं और यह, ज्ञाता और ज्ञेय में कोई भेद नहीं है। अपर विमर्श अणु (जीव, व्यक्ति) का है जिसमें ‘मैं’ और ‘यह’ में ‘ज्ञाता’ और ‘ज्ञेय’ में सर्वथा भेद है। परापर विमर्श शक्ति का है जिसमें भेदाभेद है अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय का भेद होने पर भी उसका अतिक्रमण होता रहता है। १७४. ‘कालाग्न्यादेः चरमकलापर्यन्तस्य’—निवृत्तिकला के अन्तर्गत काला- ग्निभुवनेश से लेकर अन्तिम कला तक। निवृत्तिकला सृष्टि की निम्नतम कला है। शान्ताकलासृष्टि की उच्चतम कला है। यहाँ पर ‘कला’ का अर्थ है ‘सृष्टि का भाग’। सृष्टि की कलाओं को समझने के लिए संलग्न रेखाचित्र देखिए। १७५. संविद्देवताचक्रम्—संविद्देवतासमूह। समष्टि की दृष्टि से खेचरीचक्र, गोचरीचक्र, दिक्‌चरीचक्र और भूचरीचक्र संविद्देवता हैं। व्यष्टि की दृष्टि से परिमित प्रमाता, अन्तःकरण, बहिष्करण ओर प्रमेय संविद्देवता हैं। १७६ चमत्कार—सृष्टि क्रिया के अद्भुत आनन्द को चमत्कार कहते हैं। यहाँ पर इसका भाव है ‘अहंविमर्श’—पूर्णाहन्ता का आनन्द, समस्त सृष्टि को अहंभाव से समझने का आनन्द। यह अहंविमर्श प्रकाश के साथ एकसद्- भाव का परिणाम है। ‘प्रकाश’ और ‘विमर्श’ के विषय में देखिए टि० २१। परमसत् प्रकाश—विमर्शमय है। वह व्यक्त और अव्यक्त रूप में विश्व भी है और उसका शाश्वत अधिष्ठान भी है। १७७ प्रकाश के साथ एक सद्भाव—क्षेमराज ने यहाँ पर सत् का आरो- हणक्रम से वर्णन किया है। पहली अवस्था है—सवेद्य वा प्रमेय—जो कुछ भी ज्ञेय वस्तु है। दूसरी अवस्था है संवेदन वा प्रमाण अर्थात् ज्ञान। तीसरी अवस्था है—सदाशिव जिसकी चेतना शरीर इत्यादि परिच्छिन्न उपाधियों से एकीकृत नहीं रहती, प्रत्युत समस्त विश्व ही जिसका शरीर है। चरम

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१४० प्रत्यभिज्ञाहृदय अवस्था है महेश्वर जिसकी आत्मसंवित्ति में समस्त सृष्टि समाविष्ट है और जिसका प्रकाश से एक सद्भाव है। १७८ आदिक्षान्तामायीयशब्दराशिपरमर्श—'अ' लेकर 'क्ष' तक अमा- यीय शब्द राशि की स्मृति के कारण—तंत्र के अनुसार पराशक्ति (चरम ईश्वरीय सर्जनात्मक शक्ति जिसके द्वारा विश्व का आविर्भाव होता है) और परावाक् (चरम ईश्वरीय शब्द जो समस्त शब्दराशि का उत्स हैं) एक ही है। प्रत्येक पद वाचक कहलाता है और प्रत्येक अर्थवाच्य कहलाता है। वाच्य वा अर्थ ईश्वरीय शब्द का आशय मात्र है, वह केवल ईश्वरीय शब्द का दृश्य रूप है। ईश्वरीय शब्द अमायीय है अर्थात् माया के क्षेत्र से परे है। शब्द दो प्रकार के हैं—मायीय (माया के क्षेत्र के) और अमायीय (माया के क्षेत्र से परे)। मायीय शब्द वे हैं जिनका अर्थ लौकिक परिपाटी के अनुसार आरोपित होता है। वे विकल्प मात्र हैं। अमायीय शब्द वे हैं जो निर्विकल्प हैं जिनका अर्थ सत्य है, जो कल्पना, आरोपण अथवा रूढ़ि के परिणाम नहीं हैं, जो चिन्मय हैं। परामर्श—जो कुछ वाच्य-वाचक जगत् है वह अमायीय शब्दराशि के रूप में महेश्वर में वर्तमान है। सृष्टि महेश्वर की अपनी शब्दराशि की स्मृति मात्र है, और कुछ नहीं। १७६, जगदानन्द—जगत् रूपी आनन्द। जगदानन्द इस दर्शन का एक पारिभाषिक शब्द है। इसका अर्थ है महेश्वर का आनन्द जो जगत् के रूप में फूट निकलता है। इस दर्शन में जगत महेश्वर के आनन्द की च्युति नहीं है, प्रत्युत जगत् उसके आनन्द की अभिव्यक्ति है। जगत् उसके आनन्द का दृश्य रूप है। अभिनव गुप्त के जादानन्द के विषय में निम्नलिखित श्लोक हैं:— यत्रकोऽपि व्यदच्छेदोनास्तियद्विश्वतः स्फुरत् यदनाहतसंवित्ति परमामृतबृंहितम् ॥ यत्रास्तिभावनादीनां न मुख्या कापि संगतिः । तदेव जगदानन्दमस्मभ्यं शंभुरुक्तवान् ॥ (तंत्रः खं० ३, ५ आ० ५०-५१) सब ओर से प्रकाशमान होने के कारण जिसमें कोई विभाग नहीं है, जिसमें चेतना अक्षुण्ण और अविकल है अर्थात् जिसमें चेतना ही अपने को प्रमाता, प्रमाण और प्रमेय के रूप में अभिव्यक्त कर रही है, जो महेश्वर के आनन्दरूपी अमृत से प्रसारित है जिसमें ध्यान इत्यादि की कोई आवश्यकता ही नहीं है वही जगदानन्द है—ऐसा मुझको शम्भु ने बतलाया है। (शम्भु अभिनवगुप्त के गुरु का नाम है जिन्होंने उनको त्रिकदर्शन सिखलाया था)।

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टिप्पणियाँ १४१ जयरथ ने जगदानन्द के भाव को अपनी व्याख्या में इस प्रकार व्यक्त किया है :- जगता निजानन्दाद्यात्मना विश्वेन रूपेणानन्दो यत्र यतश्चेति जगदानन्द- शब्दवाच्यम् । “महेश्वर का अपना आनन्द जगत् के रूप में सब ओर से दृश्यमान होना जगदानन्द है”। १८०. अकुल—“कुलं शक्तिरितिप्रोक्तं, अकुलं शिव उच्यते”। (स्वच्छन्द तंत्र) आगम में शक्ति को 'कुल' कहते हैं और शिव को 'अकुल'। कुल अर्थात् समस्त जगत् शक्ति है। जो जगत् मात्र में लुप्त नहीं है, जगत् मात्र में खो नहीं गया है, वह 'अकुल' अर्थात् शिव है। 'अ' अक्षर मातृकाचक्र की दृष्टि से 'अनुत्तर' या 'अकुल' का द्योतक है। १८१. प्रत्याहार—यहाँ पर प्रत्याहार शब्द संस्कृत व्याकरण के एक पारि- भाषिक अर्थ में प्रयुक्त हुआ है। सूत्र अथवा सूत्रों के पहले अक्षर और अंतिम अक्षर को मिलाकर जो एक शब्द बनता है उसे प्रत्याहार कहते हैं। उदा- हरणार्थ अइउण्, ऋऌक्, एओ०, ऐऔच् सूत्रों का पहला अक्षर 'अ' है और अन्तिम अक्षर 'च्' है; इन दोनों को मिलाकर अच् प्रत्याहार बनता है। अच् कहने से अ, इ, उ, ऋ, ऌ, ए, ओ, ऐ, और औ इन अक्षरों का बोध होता है। प्रत्येक सूत्र का अन्तिम हलन्त अक्षर केवल प्रत्याहार बनाने के लिए है। वह किसी अक्षर का द्योतक नहीं है। इस प्रसङ्ग में पहले अक्षर 'अ' और अन्तिम अक्षर 'ह' को मिलाने से 'अह्' प्रत्याहार बनता है जो कि संस्कृत के 'अहं' शब्द का सूचक है जिसका अर्थ होता हैं 'मैं, आत्मा'। 'अह्' प्रत्याहार के भीतर अ से ह तक संस्कृत भाषा का प्रत्येक अक्षर समाविष्ट है। आगमकी दृष्टि से प्रत्येक अक्षर वाचक है जो एक वाच्य को सूचित करता है अर्थात् प्रत्येक अक्षर एक पदार्थ का द्योतक है अतः 'अह्' प्रत्याहार में सभी अक्षर आ जाते हैं, अतः 'अह्' वा 'अहं' विश्व के सभी पदार्थों का सूचक है। परम शिव की 'अह' (मैं) की अनुभूति में समस्त विश्व अव्याकृत अभिन्न रूप में निहित है। १८६. बिन्दु—बिन्दु का अर्थ है बिन्दी, नुकता। अनुत्तर अर्थात् परमशिव के प्रशान्त महासागर में क्षोभ का, तनाव का एक कण उठता है। यह बिन्दु है। इसमें भावी विश्व अव्यक्त रूप से निहित रहता है। इस बिन्दु को 'घनीभूता शक्ति' कहते हैं। यह अभी पदार्थों में व्यक्त नहीं हुई है। यह चिद्घन है, घनीभूतसंवित् है जिसमें भावी समस्त विश्व और प्राणी सम्भाव्यरूप में, अविशिष्ट रूप में, अव्याकृतरूप में

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१४२ प्रत्यभिज्ञाहृदय निहित हैं। इसलिए व्याख्याकार क्षेमराज ने लिखा है कि 'अ' और 'ह' सम्पु- टीभूत रूप में समस्त सम्भाव्य विश्व को संगृहीत किये हुए अनुत्तर में, परम- शिव में, एक अविशिष्ट बिन्दु के रूप में पड़ा रहता है। बिन्दु अविशेष का, अभेद का द्योतक है। (संस्कृत) भाषा में बिन्दु अनुस्वार के द्वारा अक्षर के ऊपर एक बिन्दी रखकर व्यक्त किया जाता है। जैसा कि कहा जा चुका है, 'अ' और 'ह' में समस्त विश्व संगृहीत है। 'अ' और 'ह' के अविभाग को व्यक्त करने के लिए उस पर अनुस्वार का बिन्दु रखा हुआ है और इस प्रकार 'अह' 'अहं' के रूप में वर्तमान रहता है। यह अहं परमशिव का विमर्श है जो इस बात का द्योतक है कि समस्त विश्व बीज रूपेण शिव में निहित है और उससे अभिन्न है। 'अ' शिव का प्रतीक है, 'ह' शक्ति का प्रतीक है, उसपर जो अनुस्वार बिन्दु है, वह इस बात का द्योतक है कि यद्यपि शिव अपनी शक्ति के द्वारा पृथ्वी तक में व्यक्त है, वह इस व्यक्तीकरण से विभक्त नहीं हो जाता, वह स्वरूपतः अविभक्त, पूर्ण रहता है। इसी बात को क्षेमराज ने 'अविभागवेदनात्मक बिन्दुरूपतया' इन शब्दों में स्पष्ट किया है। १८३. प्रकाशस्य-मूल में जो 'प्रकाशस्य' शब्द है, उसका यहाँ पर अर्थ है 'घटसुखादिवेद्यप्रकाशस्य' घट (वाह्य) और सुख (आन्तरिक) जो कुछ भी वेद्य रूपी प्रकाश है उसकी (विश्रान्ति)। १८४. महाह्रद-महासरोवर। परम अहंविमर्श अथवा परम आध्यात्मिक आत्मचेतना को 'महाह्रद' कहा है। इसको 'महा' इसलिए कहा है क्योंकि यह अतिगंभीर है, स्वच्छ है और अपरिच्छिन्न है। १८५. 'सम्बन्ध स्थापित करने का भाव है' 'परमशिव के अहंविमर्श से तादात्म्य स्थापित करना।' १८६. 'विवरणकार' से कल्लटाचार्य का निर्देश किया है जो वसुगुप्त के शिष्य थे और जिन्होंने 'स्पन्दकारिका' पर एक वृत्ति लिखी थी। कल्लट ईसवी ६वीं शती में हुए थे। १८७. संवित्तिदेवताचक्र-जब इन्द्रियाँ पूर्ण रूपेण पवित्र होकर देवतातुल्य हो जाती हैं तब उनके चक्र (समूह) को 'सांवित्तिदेवताचक्र' कहते हैं। १८८. 'चक्रवर्ती' शब्द में श्लेष है। एक अर्थ है चक्र (इन्द्रियसम्मूह) का शासक। दूसरा अर्थ है 'सार्वभौम सम्राट्'।

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पारिभाषिक शब्दों का कोश अ अ अनुत्तर, शिव अकुल शिव, जो कुल अर्थात् शक्ति नहीं है, शिव है। अख्याति अज्ञान अधःकुण्डलिनी लम्बिका से लेकर मूलाधार के ३ १/२ वलय तक कुण्डलिनी का क्षेत्र (दे० टि० १६०) अधोवक्त्र गुदा के मूल में स्थित मेढ्रकन्द अनचक शब्दार्थ-व्यञ्जन का बिना स्वर के उच्चारण, गूढार्थ-किसी मंत्र की मानस अवस्था पर ध्यान जहाँ उसका उच्चारण नही होता। अनन्तभट्टारक मंत्रप्रमाताओं का अधिष्ठाता। अन्तकोटि अन्तिम स्थल; हृदय से बारह अंगुलियों के अन्तर का स्थल जिसे द्वादशान्त कहते हैं। अन्तर्मुखी भाव चित्त का भीतर की ओर मुड़ना, प्रत्यग्वृत्ति। अनाश्रितशिव शिव की वह अवस्था जिसमें कोई ग्राह्य नहीं है, जिसके सम्मुख केवल शून्य है, विश्व प्रति- षिद्ध हो गया है। अनुग्रह दैवीकृपा अनुत्तर जिससे बढ़कर और कोई नहीं है, परम असीमसत्, परमार्थ। अपर निम्न अपवर्ग मोक्ष अपान बाहर से भीतर की ओर, गुदा की ओर चलनेवासी वायु। अमायीय माया के प्रभाव से परे; अमायीय शब्द वह है जिसमें पद और अर्थ एकात्म होते हैं। अर्थ उद्देश्य; लक्ष्य; इन्द्रियों का विषय। अलंग्रास ग्राह्य को पूरी तौर से निगल जाना अर्थात् उसको इस प्रकार आत्मसात् कर लेना कि वह आत्मचेतना से भिन्न न जान पड़े।

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१४४ प्रत्यभिज्ञाहृदय अव्यक्त अप्रकट; अदृश्य, अनाविर्भूत । असत् जिसका अस्तित्व न हो, सत् से विपरीत । अहन्ता अहं अर्थात् मैं की चेतना । अहंभाव मैं का भाव, मैं की अनुभूति । आ आणवमल अणु अर्थात् जीव का जन्मजात अज्ञान, वह आद्य परिमितता जिसके द्वारा सार्वभौम चेतनता जीव बन जाती है, बोध से शक्ति चली जाती है और शक्ति से बोध चला जाता है और इस प्रकार अपूर्णता का बोध होता है। आत्मविश्रान्ति आत्मा में, अपने में विश्राम या ठहराव । आत्मसात्कार अपने में समीकरण; स्वांगीकरण । आदिकोटि प्रथम कोटि; हृदय जहाँ से प्राण उमड़ता है । आनन्द आनन्द; शक्ति का स्वरूप । आभासन शब्दार्थ-आभास, गूढ़ार्थ-सृष्टि । आर्हत जैन । आश्यानता सिमट जाने की स्थितिः सूख जाने की स्थिति; ठोस हो जाने की स्थिति । इ इच्छा सदाशिव की प्रधान चेतना । इदन्ता इदं (यह) की चेतना, यह का परामर्श । ई ईश्वरतत्त्व शिव से गिनने पर (शिव, शक्ति, सदाशिव, ईश्वर) चौथा तत्त्व; ईश्वर तत्त्व में अहं (मैं) और इदं (यह) दोनों परामर्श (चेतना) स्फुट रहता है । इसमें अहं और इदं दोनों की चेतना उभरी हुई रहती है । ईश्वरभट्टारक ईश्वरतत्त्व में व्यवस्थित मंत्रेश्वरों का अधिष्ठाता । उ उदान वह प्राण जो ऊपर की ओर जाता है; वह प्राण वा शक्ति जो सुषुम्ना में होती हुई ऊपर

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१० पारिभाषिक शब्दों का कोश १४५ की ओर चलती है और आत्मिक चेतना घटित करती है । उद्वमन्ती शब्दार्थ-वमन करती हुई. भावार्थ—बाहर करती हुई, व्यक्त करती हुई । उन्मेष शब्दार्थ-आँख का खुलना। भावार्थ-सृष्टि का प्रारम्भ । शैवयोग में-आत्मिक चेतना का स्फुरण या विकास जो कि विचारों की स्पन्दभूमि या अधिष्ठान है । उन्मीलन शब्दार्थ-आँख का खुलना; भावार्थ-अव- स्थित का प्रकटीकरण, व्यक्त होना । उन्मीलन समाधि चित्त की वह स्थिति जिसमें आँख खुले रहने पर भी बाह्य जगत् सर्वव्यापी चेतना या शिवरूप प्रतीत होने लगता है । ऊ ऊर्ध्वकुण्डलिनी जब प्राण और अपान सुषुम्ना में प्रवेश कर जाते हैं, तब ऊपर के भाग की कुण्डलिनी शक्ति । क कंचुक कोश करणेश्वर्यः खेचरी-गोचरी,-दिक्-चरी-भूचरी चक्र । कला कर्तृत्व, परिमितकर्तृत्व, अभिव्यक्ति की प्रावस्था, अंश, अक्षर या शब्दांश (ह कला- पर्यन्त) । कुल शक्ति कारण किसी का हेतुः वह जिससे कार्य की उत्पत्ति हो । कार्ममल कर्म के परिणामस्वरूप चित्त में अवस्थित वासना या संस्कार का मल । कार्य कारण का परिणाम काल वह शक्ति जिससे समय या क्रम निष्पन्न होता है । कालाग्नि निवृत्तिकला का निम्नतम भुवन (दे० टि० १७४)

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१४६ प्रत्यभिज्ञाहृदय कुल शक्ति कुलाम्नाय शाक्त शास्त्र या सिद्धान्त क्रिया कार्य, शुद्धविद्या की शक्ति ख खेचरी वामेश्वरी शक्ति की उपजाति, प्रमाता से सम्बद्ध शक्ति, वह शक्ति जो खे (आकाश में) चरी (चलने वाली) है—आकाश इस सन्दर्भ में चेतना का प्रतीक है : ख्याति ज्ञान ग गोचरी वामेश्वरी शक्ति की उपजाति, प्रमाता के अन्तःकरण से सम्बद्ध। 'गो' शब्द का अर्थ है इन्द्रिय, अन्तःकरण इन्द्रियों का आश्रय है, अतः गोचरी अन्तःकरण से सम्बद्ध है। ग्राहक ज्ञाता, प्रमाता, विकल्पमय जीव ग्राह्य ज्ञेय : विषय । च चमत्कार पूर्णाहन्ता का आनन्द : कलाजन्य आनन्द का अनुभव । चरमकला शान्त्यतीत कला अथवा शान्तातीत कला, अभिव्यक्ति का सर्वोत्कृष्ट अवस्थान । चार्वाक भौतिकवादी; अनात्मवादी, यदृच्छावादी स्वभाववादी। चार्वाक दर्शन भौतिकवादी-अनात्मवादी-यदृच्छावादी दर्शन चित् शुद्ध परम निरूपाधिक चैतन्य सब विकारों का अविकृत अधिष्ठान । चित्त चितिशक्ति के संकोच से जन्य सत्वप्रधान- स्वरूपी चेतना; मायाप्रमाता का स्वरूप । चेतन आत्मा : परमेश्वर, चैतन्यविशिष्ट जीव, प्राणी । चेत्य ज्ञेय, चेतना का विषय ।

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पारिभाषिक शब्दों का कोश १४७ छ छेव अनच्क की ध्वनि से प्राण और अपान का निरोध ज जगत् गच्छति इति जगत्-जो बराबर चलता रहे, स्थायी न हो। जगदानन्द आत्मा या महेश्वर का आनन्द जो जगत् के रूप में अभिव्यक्त है। जाग्रत् जागते रहने की अवस्था; वह अवस्था जिसमें जीव शब्द, स्पर्श इत्यादि विषयों का ग्रहण करता रहता है। जीव देहावच्छिन्न चैतन्य, जीवात्मा। जीवन्मुक्ति देहमें रहते हुए, जीते जी हो जानेवाली मुक्ति ज्ञान सच्चा बोध; ईश्वर की शक्ति त तत्त्व वहपन, किसी वस्तु का वस्तुत्व, सार, आद्य अथवा मूलरूप तनुता क्रमशः कम होता जाना, सूक्ष्मता, प्रह्सन, लघूकरण तमस् प्रकृति का स्थित्यात्मक गुण, मोह तर्कशास्त्र ऊहापोह का शास्त्र, युक्तिशास्त्र तांत्रिक तंत्र का अनुयायी त्रिक तीन-(१) शिव, (२) शक्ति, (३) नर, अथवा पर (१), परापर (२), अपर (३) का दर्शन वा शास्त्र तुरीय जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति से परे चेतना की चौथी अवस्था जो तीनों अवस्थाओं को एक सूत्र में बाँधती है, अविकल चेतना मनोवैज्ञानिक प्रमाता से भिन्न दृक् चैतन्य, साक्षिचैतन्य। तुर्य तुरीय तुर्यातीत तुर्य से परे चेतना की अवस्था जिसमें तीन- जाग्रत् स्वप्न, सुषुप्ति अवस्थाओं का भेद

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१४८ प्रत्यभिज्ञाहृदय समाप्त हो जाता है, वह आनन्दमय शुद्ध चेतना जिसमें कोई विकार नहीं होता, जिसमें विश्व अपना आत्मा ही जान पड़ता है। द दर्शन तत्त्वज्ञान करानेवाला शास्त्र। दिक्‌चरी दिशाओं में चलनेवाली, वामेश्वरी शक्ति का वह प्रकार जो बहिष्करण अर्थात् बाह्येन्द्रियों से सम्बद्ध है। दिक् का अर्थ है देश या दिशा। बाह्येन्द्रियों का सम्बन्ध देश से है। इसलिए बहिष्करण दिक्‌चरी शक्ति का क्षेत्र हैं। देश फैलाव, दिक् न नित्यत्व सनातनत्व निभालन देखना, मानसिक अभ्यास निमीलनसमाधि ध्यान की वह आन्तरिक अवस्था जिसमें व्यष्टि चेतना समष्टि चेतना में समाहित हो जाती है। निमेष पलक मारना, विश्व का परम शिव में लीन हो जाना। नियति कार्य-कारण द्वारा संकोच, देश-संबंधी संकोच। नैयायिक न्यायशास्त्र का विद्वान् या न्याय का अनुसरण करनेवाला। प पंचकृत्य सृष्टि, स्थिति, संहार, विलय और अनुग्रह ये शिव के पाँच कृत्य अथवा योगी के आभासन, रक्ति, विमर्शन, बीजावस्थापन, विलापन-ये पाँच कृत्य। पति प्रभु, शिव पतिदशा परप्रमातृदशा, शुद्धाध्वप्रमातृता, मुक्ति। पर सर्वोत्कृष्ट परप्रमाता सर्वोत्कृष्ट ज्ञाता, परमशिव

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पारिभाषिक शब्दों का कोश १४६ परमशिव परमसत्, परमार्थ, अनुत्तर, विश्वोत्तीर्ण- विश्वात्मक परमानन्दमय प्रकाशघन शिव । परमार्थ सर्वोत्कृष्टसत्, तात्विकसत्य, यथार्थतत्व, सर्वोत्कृष्ट लक्ष्य । परापर पर (परमार्थ, अद्वय) और अपर (भेद) दोनों, सर्वथा अद्वय और सर्वथा भेद दोनों के बीच की अवस्था, भेदाभेद-भेद के भीतर अभेद । परामर्श मानसिक पकड़, अनुभव, बोध, स्मरण करना । पराशक्ति परमशिव की सर्वोत्कृष्टशक्ति, चिति, पार- मेश्वरीस्वातंत्र्यशक्ति । परावाक् परमशिव की चित्-स्पन्द रूपी शक्ति : अव्यक्त शब्द; विश्वचेतना, किसी अन्य की अपेक्षा न करती हुई अहंपरामर्शमयी पराशक्ति, परमा- न्दात्मक स्वातंत्र्यशक्ति । परिच्छन्न परिसीमित । परिणाम विकार, एक अवस्था से दूसरी अवस्था को प्राप्त होना, रूपान्तर होना । पशु अविद्या इत्यादि पाश में बँधा हुआ जीव, अज्ञानी । पश्यन्ती परमशिव का होनेवाले विश्व का अविशिष्ट रूप में ईक्षण, वाक्शक्ति की सर्जन की उन्मुखता जिस अवस्था में वाच्य (अर्थ) और वाचक (पद) अभिन्न रहते हैं । पांचरात्र वैष्णवदर्शन, इस दर्शन का अनुयायी पांचरात्रिक वैष्णव दर्शन वा मार्ग का अनुयायी पाश बन्धन, रस्सी पुर्यष्टक पंचतन्मात्रा, बुद्धि, अहंकार और मन—इन आठों की पुरी वा समूह, सूक्ष्मशरीर । पूर्णत्व सर्वोत्तम अवस्था । पूर्णाहन्ता पूर्ण अहंचेतना जिसमें ज्ञाता और ज्ञेय का कोई भेद नहीं रहता । पृथिवी पंचमहाभूतों में ठोस तत्त्व । प्रकाश आत्माभिव्यक्ति-तत्त्व, चैतन्य जिसके द्वारा सब कुछ प्रकाशित होता है ।

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१५० प्रत्यभिज्ञाहृदय प्रकृति बुद्धि से लेकर पृथिवी तक की अभिव्यक्ति का उत्स वा प्रभव। प्रत्यभिज्ञा पहचान, यह ज्ञान कि परमेश्वर और जीवात्मा एक है। प्रत्याहार सूत्र के प्रथम वर्ण (अक्षर) और अन्तिम निर्देशनात्मक वर्ण (अक्षर) के संयोग से बना हुआ एक शब्द जो कि कई वर्णों का सूचक होता है। (दे० टि० १७५)। योग की वह क्रिया जिसमें इन्द्रियों को विषयों से हटाकर निरुद्ध किया जाता है। प्रथ विस्तृत होना, विकसित होना, प्रदर्शित होना प्रथा बढ़ने, फैलने, विकसित होने, प्रदर्शित होने का ढंग, रीति, परिपाटी। प्रमाण प्रमा (सच्चे ज्ञान) का करण या साधन; सबूत। प्रमाता ज्ञाता, प्रमाण द्वारा किसी वस्तु का ज्ञान प्राप्त करनेवाला, अनुभव करनेवाला। प्रमेय प्रमा या ज्ञान का विषय। प्रलयाकल अथवा प्रलयकेवली मायातत्व में अवस्थित शून्य का प्रमाता। प्रसर फैलाव, शिव का अपनी शक्ति द्वारा विश्वरूप में अभिव्यक्ति। प्राण जीवन शक्ति, प्रश्वासवायु। प्राणायाम श्वास-प्रश्वासगति का नियमन। ब बन्ध बन्धन, योग की वह क्रिया जिसमें शरीर के कुछ भाग संकुचित करके एक विशेष स्थिति में परिबद्ध कर लिये जाते हैं। बल इस दर्शन में बल का अर्थ है 'चिद्बल'-चित् अथवा आत्मा की शक्ति। बहिर्मुखता चेतना की बाहर की ओर उन्मुखता, पराक्चेतना। बहिर्मुखी भाव बहिर्मुखता की अवस्था या दशा।

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पारिभाषिक शब्दों का कोश १५१ बिन्दु (विन्दु) बूंद, नुक्ता, आतिभौतिक बूंद अर्थात् घनी- भूता शक्ति जो कि एक अविशिष्ट विन्दु में संहृत होकर सर्जन के लिए उन्मुख है, पर प्रमाता, अनुस्वार जो कि अहं के ऊपर बिन्दु रूप में रखा हुआ (अहं) यह संकेत करता है कि शिव 'अ' से लेकर 'ह' तक जगत् में विभिन्न रूप से अभिव्यक्त होने पर भी अभिन्न है (दे० टि० १७६) । बीजावस्थापन बीज का रखना, गूढ़ार्थ-विलय अर्थात् अपने वास्तविक स्वरूप को संगोपित या छिपा रखना । बुद्धि व्यवसायात्मिका अर्थात् निश्चयात्मिका चेतना, चेतना की वह स्थिति जिसमें जीव अंधकार से जग जाता है । बैन्दवी कला बैन्दवी-बिन्दु सम्बन्धी-इस प्रसंग में बिन्दु का अर्थ है परप्रमाता; कला-कौशल, स्वातंत्र्य । बैन्दवीकला परमशिव का वह कौशल, वह स्वातंत्र्य जिससे प्रमाता सदा प्रमाता बना रहता है और कभी प्रमेय में अन्तर्भूत नहीं होता । ब्रह्मनाडी सुषुम्ना, मध्यप्राण नाडी ब्रह्मारन्ध्र सहस्रार चक्र ब्रह्मवाद (इस दर्शन में) शांकरवेदान्त । भ भाव बाह्य अथवा आन्तरिक सत्ता, विषय । भुवन होना, होने का स्थान, लोक, आलय । भूचरी वामेश्वरी शक्ति का एक प्रकार जो कि भावों से सम्बद्ध है । भूमिका अभिनेय अंश, गृहीतकार्य । भैरव परमशिव । यह भ, र, और व की अक्षरमुष्टि है । भ 'भरण' (स्थिति) का द्योतक है, र 'रवण' (संहार) का द्योतक है और व 'वमन' (सृष्टि) का द्योतक है । भोग सुख-दुःख का अनुभव-कभी कभी सुखमात्र के संकुचित अर्थ में यह शब्द प्रयुक्त होता है ।

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१५२ प्रत्यभिज्ञाहृदय भोक्ता सुखदुःख का अनुभव करनेवाला । म मध्य संवित्, शुद्ध अहन्ता, सुषुम्ना अर्थात् मध्यनाड़ी मध्यधाम सुषुम्ना, ब्रह्मनाड़ी मध्यमा स्थूल अभिव्यक्ति के पूर्व बुद्धिनिष्ठ वाक्शक्ति। मध्यशक्ति संवित् शक्ति मन्त्र वह प्रमाता जिसने शुद्ध विद्या का साक्षात्कार कर लिया है; विद्यातत्त्व में अध्यासीन प्रमाता; वह शब्द या शब्दसमूह जिसका जप या ध्यान किया जाय । मन्त्रमहेश्वर वह प्रमाता जिसने सदाशिवतत्त्व का साक्षा- त्कार कर लिया है । मन्त्रेश्वर वह प्रमाता जिसने ईश्वरतत्त्व का साक्षात्कार कर लिया है । महामन्त्र शुद्ध चेतना का, पूर्णाहन्ता का मन्त्र । महार्थ परमोत्कृष्ट लक्ष्य, शुद्धपूर्णाहन्तापद, कौल- साधना । महेश्वर परमेश्वर, परमशिव, अनुत्तर माध्यमिक बौद्ध मध्यमकदर्शन का अनुयायी । माया 'मा' धातु से निष्पन्न 'मापना' । अनन्त की मेय और परिच्छिन्न बनाने की, आवरण और विक्षेप की शक्ति, शुद्धविद्या से नीचे का तत्त्व, पाँच कञ्चुकों की योनि । मायाप्रमाता माया द्वारा वशीभूत जीव । मायीयमल माया के द्वारा मल या संकोच जिससे जीव के स्थूल और सूक्ष्म शरीर बनते हैं और भेद की प्रतीति होती है । माहैश्वर्य महेश्वर की शक्ति । मीमांसक मीमांसा दर्शन का अनुयायी । मुक्ति आत्मतत्त्व का परिज्ञान, अज्ञानग्रंथि के भेद से स्वात्मशक्ति की अभिव्यक्ति, परमशिवी भाव । मुद्रा आध्यात्मिक आनन्द (मुद) को देनेवाली (रा) स्थिति, तुर्यचेतना में विश्व को मुहरबन्द