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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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प्रत्याहार और धारणा ८३

होते जा रहे हैं, दिन-पर-दिन मन कुछ-कुछ स्थिर होता आ रहा है। पहले कुछ महीने देखोगे, तुम्हारे मन मे हजारो विचार आएँगे, क्रमश वह संख्या घटकर सैकडो तक रह जायगी। फिर कुछ और महीने बाद वह और भी घट जायगी, और अन्त में मन पूर्ण रूप से अपने वश मे आ जायगा। पर हाँ, हमे प्रतिदिन धैर्य के साथ अभ्यास करना होगा। जब तक इंजन के भीतर भाप रहेगी, तब तक वह चलता ही रहेगा। जब तक विषय हमारे सामने हैं, तब तक हम उन्हे देखेंगे ही। (अतएव, मनुष्य को, यह प्रमाणित करने के लिए कि वह इंजन की तरह एक यन्त्र मात्र नहीं है, यह दिखाना आवश्यक है कि वह किसी के अधीन नही। इस प्रकार मन का सयम करना और उसे विभिन्न इन्द्रियों के साथ सयुक्त न होने देना ही प्रत्याहार है। इसके अभ्यास का क्या उपाय है ? यह एक-दो दिन का काम नहीं, बहुत दिनो तक लगातार इसका अभ्यास करना होगा। धीर भाव से लगातार बहुत वर्षो तक अभ्यास करने पर तब कही इस विषय मे सफलता मिल पाती है।

कुछ काल तक प्रत्याहार की साधना करने के बाद, उसके बाद की साधना अर्थात् धारणा का अभ्यास करने का प्रयत्न करना होगा। प्रत्याहार के बाद है धारणा। धारणा का अर्थ है—मन को देह के भीतर या उसके बाहर किसी स्थानविशेष में धारण या स्थापन करना। मन को स्थानविशेष मे धारण करने का अर्थ क्या है ? इसका अर्थ यह है कि मन को शरीर के अन्य सब स्थानों से अलग करके किसी एक विशेष अश के अनुभव मे बलपूर्वक लगाए रखना। मान लो, मैंने मन को हाथ मे धारण किया। तब शरीर के अन्यान्य अवयव विचार के विषय के बाहर हो जायेंगे।