राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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राजयोग
छोड दो। यही सिद्ध होने का उपाय है, और इसी उपाय से बडे-बडे धर्मवीरो की उत्पत्ति हुई है। शेष सब तो बाते करनेवाले यन्त्र मात्र है। यदि हम सचमुच स्वय कृतार्थ होना और दूसरो का उद्धार करना चाहे, तो हमें थोथी बकवास छोडकर और भी भीतर प्रवेश करना होगा। इसे कार्य में परिणत करने का पहला सोपान यह है कि मन किसी तरह चंचल न किया जाय। जिनके साथ बातचीत करने पर मन चंचल हो जाता हो, उनका साथ छोड दो। तुम सबको मालूम है कि तुममें से प्रत्येक का किसी स्थानविशेष, व्यक्तिविशेष और खाद्यविशेष के प्रति एक विरक्ति का भाव रहता है। उन सबका परित्याग कर देना। और जो सर्वोच्च अवस्था की प्राप्ति के अभिलाषी हैं, उन्हें तो सत्-असत् सब प्रकार के संग को त्याग देना होगा। पूरी लगनके साथ, कमर कसकर साधना में लग जाओ—फिर मृत्यु भी आए तो क्या ! "मन्त्र वा साधयामी शरीर वा पातयामि"—काम सधे या प्राण ही जायँ। फल की ओर आँख रखे बिना साधना मे निमग्न हो जाओ। निर्भीक होकर इस प्रकार दिन-रात साधना करने पर छ महीने के भीतर ही तुम एक सिद्ध योगी हो सकते हो। परन्तु दूसरे, जो थोडी-थोडी साधना करते है, सब विषयो को जरा-जरा चखते है, वे कभी कोई बडी उन्नति नही कर सकते। केवल उपदेश सुनने से कोई फल नही होता। जो लोग तमोगुण से पूर्ण है, अज्ञानी और आलसी हैं, जिनका मन कभी किसी वस्तु पर स्थिर नही रहता, जो केवल थोडे से आनन्द के अन्वेषण में है, उनके पास धर्म और दर्शन केवल क्षणिक आनन्द के लिए हैं। जो सिर्फ थोडे से आमोद-प्रमोद के लिए धर्म करने आते है, साधना मे अध्यवसायहीन है। वे धर्म की बाते सुनकर सोचते हैं