राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextसप्तम अध्याय
ध्यान और समाधि
अब तक हम राजयोग के अन्तरग साधनो को छोड़ शेष सभी अगो के सक्षिप्त विवरण समाप्त कर चुके है। इन अन्तरग साधनो का लक्ष्य एकाग्रता की प्राप्ति है। इस एकाग्रता-शक्ति को प्राप्त करना ही राजयोग का चरम लक्ष्य है। हम, मानव के नाते, देखते है कि हमारा समस्त ज्ञान, जिसे विचारजात ज्ञान कहते हैं, अह-बोध के अधीन है। मुझे इस टेबुल का बोध हो रहा है, तुम्हारे अस्तित्व का बोध हो रहा है, इसी प्रकार मुझे अन्यान्य वस्तुओ का भी बोध हो रहा है, और इस अह-बोध के कारण ही मैं जान पा रहा हूँ कि तुम यहाँ हो, टेबुल यहाँ है, तथा और भी जो वस्तुएँ देख रहा हूँ, अनुभव कर रहा हूँ या सुन रहा हूँ, वे सब भी यही है। यह तो हुई एक ओर की बात ॥ फिर एक दूसरी ओर यह भी देख रहा हूँ कि मेरी सत्ता कहने से जो कुछ बोध होता है, उसका अधिकांश मै अनुभव नही कर सकता। शरीर के भीतर के सारे यन्त्र, मस्तिष्क के विभिन्न अश—इन सबका ज्ञान किसी को भी नही।
जब हम भोजन करते हैं, तब वह ज्ञानपूर्वक करते है, परन्तु जब हम उसका सार भाग भीतर ग्रहण करते हैं, तब हम वह अज्ञातभाव से करते हैं। जब वह खून के रूप मे परिणत होता है, तब भी वह हमारे बिना जाने ही होता है। और जब इस खून से शरीर के भिन्न-भिन्न अग गठित होते है, तो वह भी हमारी जानकारी के बिना ही होता है। किन्तु यह मारा काम हमारे द्वारा ही होता है। इस शरीर के भीतर कोई अन्य