राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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आधारभूमि पर भी विशेष रूप से, अत्यन्त सूक्ष्मता के साथ, विचार किया गया है। इन समस्त चिन्तन और विचारो का फल यह राजयोग विद्या है। यह राजयोग आजकल के अधिकांश वैज्ञानिको की अक्षम्य धारा का अवलम्बन नहीं करता—वह उनकी भाँति उन घटनाओ के अस्तित्व को एकदम उडा नहीं देता, जिनकी व्याख्या दुरूह हो, प्रत्युत वह तो धीर भाव से, पर स्पष्ट शब्दो में, अन्धविश्वास से भरे व्यक्ति को बता देता है कि यद्यपि अलौकिक घटनाएँ, प्रार्थनाओ की पूर्ति और विश्वास की शक्ति ये सब सत्य हैं, तथापि इनका स्पष्टीकरण ऐसी कुसस्कार-भरी व्याख्या द्वारा नहीं हो सकता कि ये सब व्यापार बादलो के ऊपर अवस्थित किसी व्यक्ति या कुछ व्यक्तियो द्वारा सम्पन्न होते हैं। वह घोषणा करता है कि प्रत्येक मनुष्य, सारी मानव-जाति के पीछे वर्तमान ज्ञान और शक्ति के अनन्त सागर की एक क्षुद्र प्रणाली मात्र है। वह शिक्षा देता है कि जिस प्रकार वासनाएँ और अभाव मानव के अन्तर में है, उसी प्रकार उसके भीतर ही उन अभावो के मोचन की शक्ति भी है, और जहाँ कही और जब कभी किसी वासना, अभाव या प्रार्थना की पूर्ति होती है, तो समझना होगा कि वह इस अनन्त भाण्डार से ही पूर्ण होती है, किसी अप्राकृतिक पुरुष से नहीं। अप्राकृतिक पुरुषो की भावना मानव में कार्य की शक्ति को भले ही कुछ परिमाण में उद्दीप्त कर देती हो, पर उससे आध्यात्मिक अवनति भी आती है। उससे स्वाधीनता चली जाती है, भय और कुसस्कार हृदय पर अधिकार जमा लेते हैं तथा 'मनुष्य स्वभाव से ही दुर्बलप्रकृति है' ऐसा भयकर विश्वास हममें घर कर लेता है। योगी कहते हैं कि अप्राकृतिक नाम की कोई चीज नहीं है, पर हाँ, प्रकृति में दो प्रकार की अभिव्यक्तियाँ हैं—एक है स्थूल और दूसरी, सूक्ष्म। सूक्ष्म कारण है और स्थूल, कार्य। स्थूल सहज ही इन्द्रियो द्वारा उपलब्ध की जा सकती है, पर सूक्ष्म नही। राजयोग के अभ्यास से सूक्ष्म की अनुभूति अर्जित होती रहती है।