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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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ध्यान और समाधि ९७

उससे इन सब तत्त्वों का कुछ भी नही जाना जाता। तो फिर वे सब तत्त्व उन्होने कहाँ से पाए ?

इतिहास के अध्ययन से मालूम होता है, ससार के सभी धर्म-शिक्षक तथा धर्म-प्रचारक कह गए है कि हमने ये सब सत्य जगत् के अतीत प्रदेश से पाए है। उनमे से बहुतेरे इस सम्बन्ध में अनभिज्ञ थे कि उन्होने यह सत्य ठीक कहाँ से पाया। किसी ने कहा, "एक स्वर्गीय दूत ने पक्षयुक्त मनुष्य के रूप मे मेरे पास आकर मुझसे कहा, 'हे मानव, सुनो, मै स्वर्ग से यह शुभ समाचार लाया हूँ, ग्रहण करो'।" एक दूसरे ने कहा, "तेजपुंजकाय एक देवता ने मेरे सामने आविर्भूत होकर मुझे उपदेश दिया है।" एक तीसरे ने कहा, "मैने स्वप्न मे अपने एक पूर्वज को देखा, उन्होंने मुझे इन तत्त्वो का उपदेश दिया।" इसके आगे वे और कुछ न कह सके। इस तरह विभिन्न उपायो से तत्त्वलाभ की बात कहने पर भी उन सबो का इस विषय में यही मत है कि उन्होने यह ज्ञान युक्ति-तर्क से नही पाया, वरन् उसके अतीत प्रदेश से ही उसे पाया है। इसके बारे मे योगशास्त्र का मत क्या है? उसका मत यह है कि वे जो कहते है कि युक्ति-विचार के अतीत प्रदेश से उन्होने उस ज्ञान को पाया है, यह सही है; किन्तु उनके अपने अन्दर से ही वह ज्ञान उनके पास आया है।

योगीगण कहते है, इस मन की ही ऐसी एक उच्च अवस्था है, जो युक्ति-विचार के अधिकार के अतीत है, जो ज्ञानातीत भूमि है। उस उच्चावस्था में पहुँचने पर मनुष्य तर्क के अगम्य ज्ञान को प्राप्त कर लेता है, और ऐसे मनुष्य को ही समस्त विषय-ज्ञान के अतीत परमार्थज्ञान या अतीन्द्रिय ज्ञान की प्राप्ति होती है। साधारण मानवी स्वभाव के परे, समस्त तर्क-युक्ति के