राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
Page 120 of 307
Read in contextध्यान और समाधि १०३
पास प्रकृति के ये विभिन्न परिवर्तन एक महासौन्दर्य और उदात्त भाव की छवि मात्र हैं।
इन तत्त्वो को ध्यान मे जान लेना आवश्यक है। मान लो, मैने एक शब्द सुना। पहले बाहर से एक कम्पन आया, उसके बाद स्नायविक गति उस कम्पन को मन के पास ले गई, फिर मन से एक प्रतिक्रिया हुई और उसके साथ ही साथ मुझे बाह्य वस्तु का ज्ञान हुआ। यह बाह्य वस्तु ही आकाशीय कम्पन से लेकर मानसिक प्रतिक्रिया तक सब भिन्न-भिन्न परिवर्तनो का कारण है। योगशास्त्र मे इन तीनो को क्रमशः शब्द, अर्थ और ज्ञान कहते हैं। शरीरविधानशास्त्र की भाषा मे उन्हे आकाशीय कम्पन, स्नायु और मस्तिष्क मे की गति तथा मानसिक प्रतिक्रिया कहते है। ये तीनो प्रतिक्रियाएँ सम्पूर्ण अलग होने पर भी इस समय इस तरह मिली हुई हैं कि उनका भेद समझा नही जाता। हम यथार्थ मे अभी उन तीनो मे से किसी का भी अनुभव नही कर सकते, अभी तो उनके सम्मिलन के फलस्वरूप केवल बाह्य वस्तु का अनुभव करते है। प्रत्येक अनुभव-क्रिया में ये तीन व्यापार होते हैं। हम भला उन्हे अलग क्यो न कर सकेंगे ?
प्रथमोक्त योगांगो के अभ्यास से मन जब दृढ और संयत हो जाता है तथा सूक्ष्मतर अनुभव की शक्ति प्राप्त करता है, तब उसे ध्यान मे लगाना चाहिए। पहले-पहल स्थूल वस्तु को लेकर ध्यान करना चाहिए। फिर क्रमश सूक्ष्म से सूक्ष्मतर ध्यान में हमारा अधिकार होगा, और अन्त में हम विषयशून्य अर्थात् निर्विकल्प ध्यान मे सफल हो जायंगे। मन को पहले अनुभूति के बाह्य कारण अर्थात् विषय का, फिर स्नायुओ में होनेवाली