राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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समय उसकी पूर्ति कर देते है। अत ज्ञान, भक्ति या वैराग्य योग से उनकी उपासना करो।
"जो किसी की हिंसा नही करते, जो सबके मित्र हैं, जो सबके प्रति करुणासम्पन्न है, जिनका अहकार चला गया है, जो सदैव सन्तुष्ट है, जो सर्वदा योगयुक्त, यतात्मा और दृढ निश्चय-वाले हैं, जिनका मन और बुद्धि मुझमे अर्पित हो गई है, वे ही मेरे प्रिय भक्त हैं। जिनसे लोग उद्विग्न नही होते, जो लोगो से उद्विग्न नही होते, जिन्होने अतिरिक्त हर्ष, दुख, भय और उद्वेग त्याग दिया है, ऐसे भक्त ही मेरे प्रिय हैं। जो किसी का भरोसा नही करते, जो शुचि और दक्ष है, सुख और दुख मे उदासीन है, जिनका दुख चला गया है, जो निन्दा और स्तुति मे समभावपन्न हैं, मौनी है, जो कुछ पाते हैं, उसी मे सन्तुष्ट रहते है, जिनका कोई निर्दिष्ट घर-बार नही, सारा जगत् ही जिनका घर है,-जिनकी बुद्धि स्थिर है, ऐसे व्यक्ति ही मेरे प्रिय भक्त है।"† ऐसे व्यक्ति ही योगी हो सकते हैं।
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नारद नाम के एक पहुँचे हुए ऋषि थे। जैसे मनुष्यो में ऋषि या बडे-बडे योगी रहते हैं, वैसे ही देवताओ में भी बडे-बडे योगी है। नारद भी वैसे ही एक महायोगी थे। वे सर्वत्र भ्रमण किया करते थे। एक दिन एक वन मे से जाते हुए उन्होने देखा कि एक मनुष्य ध्यान कर रहा है। वह ध्यान में इतना मग्न है और इतने दिनो से एक ही आसन पर बैठा है कि उसके चारों ओर दीमक का ढेर लग गया है। उसने नारद से पूछा, "प्रभो, आप कहाँ जा रहे है?" नारदजी ने उत्तर दिया, "मै वैकुण्ठ-
† गीता, १२।१३-१९