राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextपातंजल-योगसूत्र १२१
समस्त प्राणी स्थित है और जिनमे सब फिर से लौट जायेंगे।' इससे अधिक निश्चित बात और कुछ भी नही हो सकती। प्रकृति सर्वत्र एक ही नियम से कार्य करती है। एक लोक मे जो नियम कार्य करता है, दूसरे लाखो लोकों मे भी वह नियम कार्य करेगा। ग्रहो मे जो व्यापार देखने में आता है, इस पृथ्वी, मनुष्यमात्र और सब नक्षत्रों मे भी वही व्यापार चल रहा है। एक बडी लहर लाखो छोटी-छोटी लहरो से बनी होती है। उसी प्रकार सारे जगत् का जीवन लाखो छोटे-छोटे जीवनों की एक समष्टि मात्र है; और इन सब लाखो छोटे-छोटे जीवों की मृत्यु ही जगत् की मृत्यु है।
अब प्रश्न उठता है कि इस भगवान मे वापस जाना उच्चतर अवस्था है या निम्नतर ? योगमतावलम्बी दार्शनिक-गण इस बात के उत्तर मे दृढतापूर्वक कहते है, 'हाँ, वह उच्चतर अवस्था है।' वे कहते हैं कि मनुष्य की वर्तमान अवस्था एक अवनत अवस्था है। इस धरती पर ऐसा कोई धर्म नहीं, जो कहता हो कि मनुष्य पहले की अपेक्षा आज अधिक उन्नत अवस्था मे है। (इसका भाव यह है कि मनुष्य प्रारम्भ मे शुद्ध और पूर्ण रहता है, फिर उसकी अवनति होने लगती है और एक अवस्था ऐसी आ जाती है, जिसके नीचे वह और नही जा सकता। तब वह पुन. अपना वृत्त पूरा करने के लिए ऊपर उठने लगता है। उसे वृत्त की पूर्ति करनी ही पड़ती है। वह कितने भी नीचे क्यो न चला जाय, अन्त में उसे वृत्त का ऊपरी मोड लेना ही पडता है—अपने आदिकारण भगवान मे वापस आना ही पडता है। मनुष्य पहले भगवान से आता है, मध्य मे वह मनुष्य के रूप मे रहता है और अन्त मे पुन. भगवान के पास वापस