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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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राजयोग

प्रथम अध्याय

अवतरणिका

हमारे समस्त ज्ञान स्वानुभूति पर टिके है। आनुमानिक ज्ञान (सामान्य से सामान्यतर या सामान्य से विशेष, दोनो) की बुनियाद स्वानुभूति है। जिनको निश्चित विज्ञान (exact science) * कहते है, उनकी सत्यता सहज ही लोगो की समझ मे आ जाती है, क्योकि वे प्रत्येक व्यक्ति से कहते है—'तुम स्वयं यह देख लो कि यह बात सत्य है अथवा नही, और तब उस पर विश्वास करो।' विज्ञानवित् तुमको किसी भी विषय पर विश्वास कर बैठने को न कहेगे। उन्होने स्वय कुछ विषयो का प्रत्यक्ष अनुभव किया है और उन पर विचार करके वे कुछ सिद्धान्तो पर पहुँचे हैं। जब वे अपने उन सिद्धान्तो पर हमसे विश्वास करने के लिए कहते हैं, तब वे जन-साधारण की अनुभूति पर उनके सत्यासत्य के निर्णय का भार छोड देते हैं। प्रत्येक निश्चित विज्ञान की एक सामान्य आधार-भूमि है और उससे जो सिद्धान्त उपलब्ध होते हैं, इच्छा करने पर कोई भी उनका सत्यासत्य तत्काल समझ ले सकता है। अब प्रश्न यह हैं, धर्म की ऐसी सामान्य आधार-भूमि कोई है भी या नही? हमे इसका उत्तर देने के लिए 'हाँ' और 'नही' दोनो कहने होगे। ससार


* निश्चित विज्ञान (exact science) अर्थात् वे विज्ञान, जिनके तत्त्व इतनी दूर तक सत्य निर्णीत हुए है कि गणना के बल पर उनके द्वारा भविष्य निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है, जैसे गणित, गणित-ज्योतिष इत्यादि।