राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextपातंजल-योगसूत्र १३९-
हमारा चरित्र इन सब सस्कारो की समष्टिस্বরূপ है। जब कोई विशेष वृत्ति-प्रवाह प्रबल होता है, तब मनुष्य उसी प्रकार का हो जाता है। जब सद्गुण प्रबल होता है, तब मनुष्य सत् हो जाता है। यदि खराब भाव प्रबल हो, तो मनुष्य खराब हो जाता है। यदि आनन्द का भाव प्रबल हो, तो मनुष्य सुखी होता है। असत् अभ्यास का एकमात्र प्रतिकार है—उसका विपरीत अभ्यास। हमारे चित्त में जितने असत् अभ्यास सस्कार-बद्ध हो गए है, उन्हे सत् अभ्यास द्वारा नष्ट करना होगा। केवल सत्कार करते रहो, सर्वदा पवित्र चिन्तन करो, असत् संस्कार रोकने का बस यही एक उपाय है। ऐसा कभी मत कहो कि अमुक के उद्धार की कोई आशा नही है। क्यों ? इसलिए कि वह व्यक्ति केवल एक विशिष्ट प्रकार के चरित्र का—कुछ अभ्यासो की समष्टि का द्योतक मात्र है, और ये अभ्यास नए और सत् अभ्यास से दूर किए जा सकते हैं। चरित्र बस पुन. पुन. अभ्यास की समष्टि मात्र है और इस प्रकार का पुन पुन अभ्यास ही चरित्र का पुनर्गठन कर सकता है।
तत्र स्थितौ यत्नोऽभ्यासः ॥१३॥
**सूत्रार्थ—**उन (वृत्तियो) को पूर्णतया वश में रखने के लिए जो सतत प्रयत्न है, उसे अभ्यास कहते हैं।
**व्याख्या—**अभ्यास किसे कहते हैं? मन को दमन करने की चेष्टा अर्थात् प्रवाह-रूप में उसकी बाहर जाने की प्रवृत्ति को रोकने की चेष्टा ही अभ्यास है।
स तु दीर्घकालनैरन्तर्यसत्कारासेवितो दृढभूमिः ॥१४॥
**सूत्रार्थ—**दीर्घकाल तक परम श्रद्धा के साथ (उस परमपद की प्राप्ति के लिए) सतत चेष्टा करने से वह (अभ्यास) दृढभूमि (अर्थात् दृढ अवस्थावाला) हो जाता है।