राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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है। यह स्मरण रखना चाहिए कि मन भी प्रकृति शब्द के अन्तर्भूत है, वह प्रकृति के भीतर की वस्तु है। हमारे जो कुछ विचार है, वे सब-के-सब प्रकृति के ही अन्तर्गत हैं। विचार से लेकर सबसे स्थूलतम जड पदार्थ तक सभी प्रकृति के अन्तर्गत हैं—प्रकृति की विभिन्न अभिव्यक्ति मात्र हैं। इस प्रकृति ने मनुष्य की आत्मा को आवृत कर रखा है, और जब वह अपने इस आवरण को हटा लेती है, तब आत्मा आवरण-मुक्त हो अपनी महिमा में प्रकाशित हो जाती है। पन्द्रहवे सूत्र में जिस वैराग्य की बात बतलाई गई है, जिसके द्वारा समस्त विषयो को अर्थात् प्रकृति को वश में लाया जाता है, वह आत्मा के प्रकाशित होने में सबसे बड़ा सहायक है। अगले सूत्र में समाधि या पूर्ण एकाग्रता के लक्षण का वर्णन किया गया है। यह समाधि ही योगी का चरम लक्ष्य है।
वितर्कविचारानन्दास्मितानुगमात् सम्प्रज्ञातः ॥१७॥
सूत्रार्थ—वितर्क, विचार, आनन्द और अस्मिता—इन चारों के सम्बन्ध से युक्त (जो समाधि है, वह) सम्प्रज्ञात या सम्यक् ज्ञानपूर्वक समाधि कहलाती है।
व्याख्या—समाधि दो प्रकार की है। एक है सम्प्रज्ञात और दूसरी, असम्प्रज्ञात। इस सम्प्रज्ञात समाधि में प्रकृति को वश में करने की समस्त शक्तियाँ आती है। सम्प्रज्ञात समाधि के चार प्रकार है। इसके प्रथम प्रकार को सवितर्क समाधि कहते हैं। सब समाधियो में ही मन को अन्य सब विषयो से हटाकर विशिष्ट विषय के ध्यान मे पुन-पुन नियुक्त करना पड़ता है। इस तरह के विचार या ध्यान के विषय दो प्रकार के है। एक तो, चौबीस जड तत्त्व और दूसरा, चेतन पुरुष।