राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
Page 169 of 307
Read in context१५२ राजयोग
स पूर्वेषामपि गुरुः कालेनानवच्छेदात् ॥२६॥
सूत्रार्थ—वे प्राचीन गुरुगणों के भी गुरु हैं, क्योकि वे काल से सीमित नहीं हैं।
व्याख्या—यह सत्य है कि समस्त ज्ञान हमारे भीतर ही निहित है, पर उसे एक दूसरे ज्ञान के द्वारा जागृत करना पडता है। यद्यपि जानने की शक्ति हमारे अन्दर ही विद्यमान है, फिर भी हमे उसे जगाना पडता है। और योगियो के मतानुसार, ज्ञान को इस प्रकार जगाना अर्थात् ज्ञान का उन्मेष एक दूसरे ज्ञान के सहारे ही हो सकता है। अचेतन जड पदार्थ ज्ञान का विकास कभी नही करा सकता—केवल ज्ञान की शक्ति से ही ज्ञान का विकास होता है। हमारे अन्दर जो ज्ञान है, उसको जगाने के लिए ज्ञानी पुरुषो का हमारे पास रहना सदैव आवश्यक है। यही कारण है कि इन गुरुओ की आवश्यकता सदा ही बनी रही है। जगत् कभी भी इन आचार्यों से रहित नही हुआ। उनकी सहायता बिना कोई भी ज्ञान नही आ सकता। ईश्वर सारे गुरुओ के भी गुरु हैं, क्योकि ये सब गुरु कितने ही उन्नत क्यो न रहे हो, वे देवता या स्वर्गदूत ही क्यो न रहे हो, पर वे सब-के-सब बद्ध थे और काल से सीमित थे, किन्तु ईश्वर काल से आबद्ध नही है। योगियो के दो विशेष सिद्धान्त हैं। एक तो यह कि सान्त वस्तु की भावना करते ही मन बाध्य होकर अनन्त की भी बात सोचेगा, और यदि उस मानसिक अनुभूति का एक भाग सत्य हो, तो उसका दूसरा भाग भी अवश्यमेव सत्य होगा। क्यो ? इसलिए कि जब दोनो उस एक ही मन की अनुभूतियाँ है, तो दोनो अनुभूतियो का मूल्य समान ही होगा। मनुष्य का ज्ञान अल्प है अर्थात् मनुष्य अल्पज्ञ है—