राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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राजयोग
उन्होने देखा था, उसी का वे प्रचार कर गए। भेद इतना ही है कि इनमे से अधिकांश धर्मो मे, विशेषत आजकल, एक अद्भुत दावा हमारे सामने उपस्थित होता है, और वह यह कि ‘इस समय ये अनुभूतियाँ असम्भव है। जो धर्म के प्रथम संस्थापक हैं, वाद मे जिनके नाम से उस धर्म का प्रवर्तन और प्रचलन हुआ, ऐसे केवल थोडे व्यक्तियो के लिए ही ऐसा प्रत्यक्ष अनुभव सम्भव हुआ था। अव ऐसे अनुभव के लिए कोई रास्ता नही रहा, फलत अव धर्म पर विश्वास भर कर लेना होगा।’ इस बात को मै पूरी शक्ति से अस्वीकृत करता हूँ। यदि ससार मे किसी प्रकार के विज्ञान के किसी विषय की किसी ने कभी प्रत्यक्ष उपलब्धि की है, तो इससे इस सार्वभौमिक सिद्धान्त पर पहुँचा जा सकता है कि पहले भी कोटि-कोटि बार उसकी उपलब्धि की सम्भावना थी और भविष्य मे भी अनन्त काल तक उनकी उपलब्धि की सम्भावना बनी रहेगी। एकरूपता ही प्रकृति का एक बडा नियम है। एक बार जो घटित हुआ है, वह पुन घटित हो सकता है।
इसीलिए योग-विद्या के आचार्यगण कहते हैं कि धर्म पूर्वकालीन अनुभूतियो पर केवल स्थापित ही नही, वरन् इन अनुभूतियो से स्वय सम्पन्न हुए बिना कोई भी धार्मिक नही हो सकता। जिस विद्या के द्वारा ये अनुभूतियाँ होती है, उसका नाम है योग। धर्म के सत्यो का जब तक कोई अनुभव नही कर लेता, तब तक धर्म की बात करना ही वृथा है। भगवान के नाम पर इतनी लडाई, विरोध और झगडा क्यो? भगवान के नाम पर जितना खून बहा है, उतना और किसी कारण से नही। ऐसा क्यो? इसीलिए कि कोई भी व्यक्ति मूल तक नही गया। सब लोग पूर्वजो के कुछ आचारो का अनुमोदन करके ही सन्तुष्ट थे। वे