राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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विश्लेषण के बल से विचार को शब्द से अलग नहीं कर सकता। बहुतो का मत है कि कुछ लोग एक साथ बैठकर यह स्थिर करने लगे कि किस भाव के लिए कौनसे शब्द का प्रयोग किया जाय, और इस प्रकार भाषा की उत्पत्ति हो गई। किन्तु यह प्रमाणित हो चुका है कि यह मत भ्रमात्मक है। जब से मनुष्य विद्यमान है, तब से शब्द और भाषाएँ रही हैं। अब बात यह है कि एक भाव और एक शब्द मे परस्पर क्या सम्बन्ध है। यद्यपि हम देखते है कि एक भाव के साथ एक शब्द का रहना अनिवार्य है, तथापि ऐसा नहीं कि एक भाव एक ही शब्द द्वारा प्रकाशित हो। बीस विभिन्न देशो मे भाव एक ही होने पर भी भाषाएँ बिलकुल भिन्न-भिन्न हो सकती है। प्रत्येक भाव को प्रकट करने के लिए एक-न-एक शब्द की आवश्यकता अवश्य होगी, किन्तु इस एक भाव के प्रकाशक शब्दो का एक ही उच्चारण-विशिष्ट होना कोई आवश्यक नहीं। विभिन्न देशो मे भिन्न-भिन्न उच्चारण-विशिष्ट शब्दो का व्यवहार होगा। इसीलिए टीकाकार ने कहा है, "यद्यपि भाव और शब्द का परस्पर सम्बन्ध स्वाभाविक है तथापि एक शब्द और एक भाव के बीच एक नितान्त अलङ्घनीय सम्बन्ध ही रहे, ऐसी कोई बात नही।" * यद्यपि ये सब शब्द भिन्न-भिन्न होते है, तो भी शब्द और भाव का परस्पर सम्बन्ध स्वाभाविक है। यदि वाच्य और वाचक के बीच प्रकृत सम्बन्ध रहे, तभी यह कहा जा सकता है कि भाव और शब्द के बीच परस्पर सम्बन्ध है। यदि ऐसा न हो, तो वह वाचक शब्द कभी
* 'सर्वे एव शब्दा सर्वाकारार्थाभिधानसमर्था—इति स्थित एतैषा सर्वकारितैः स्वाभाविक. सम्बन्ध ।'—व्यासभाष्य की वाचस्पतिमिश्र-कृत टीका।