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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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१५८ राजयोग

हो जाते हैं, सूर्य, चन्द्रमा, तारे, पृथ्वी, सभी लय को प्राप्त हो जाते है, पर परमाणुओं मे का कम्पन बच रहता है। इन बड़े बड़े ब्रह्माण्डो मे जो कार्य होता है, प्रत्येक परमाणु वही कार्य करता है। ठीक ऐसा ही चित्त के बारे मे भी है। चित्त में होनेवाले सब कम्पन अदृश्य अवश्य हो जाते हैं, फिर भी परमाणु के कम्पन के समान उनकी सूक्ष्म गति अक्षुण्ण बनी रहती है, और ज्योही उन्हे कोई स्फूर्ति मिलती है, बस त्योही वे पुन बाहर आ जाते है। अब हम समझ सकेगे कि जप अर्थात् वारम्वार उच्चारण का तात्पर्य क्या है। हम लोगो के अन्दर जो धर्म के सस्कार हैं, उन्हे विशेष रूप से बल देने मे यह प्रधान सहायक है।

"क्षणमिह सज्जनसंगतिरेका। भवति भवार्णवतरणे नौका।"*

—साधुओं की एक क्षण की भी संगति भवसागर पार होने के लिए नौका-स्वरूप है। सत्संग की ऐसी जबरदस्त शक्ति है! बाह्य सत्संग की जैसी शक्ति बतलाई गई है, वैसी ही आन्तरिक सत्संग की भी है। इस ओंकार का बारम्बार जप करना और उसके अर्थ का मनन करना ही आन्तरिक सत्संग है। जप करो और उसके साथ उस शब्द के अर्थ का ध्यान करो। ऐसा करने से, देखोगे, हृदय मे ज्ञानालोक आयगा और आत्मा प्रकाशित हो जायगी।

'ॐ' शब्द पर मनन तो करोगे ही, पर साथ ही उसके अर्थ पर भी मनन करो। कुसंगति छोड़ दो, क्योकि पुराने घाव के चिह्न अभी भी बने हुए है, उन पर कुसंगति की गर्मी लगने भर की देर है कि बस वे फिर से ताजे हो उठेंगे। ठीक इसी प्रकार हम लोगो मे जो उत्तम सस्कार है, वे भले ही अभी अव्यक्त हो, पर


* शंकराचार्यकृत मोहमुद्गर, ५।