राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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न रहे, पर जब तक दूरदर्शन, दूरश्रवण आदि अलौकिक अनुभूतियाँ नही होती, तब तक इस विद्या की सत्यता के बारे मे बहुतसे सशय उपस्थित होगे। जब इन सबका थोडा-थोडा आभास आने लगता है, तो मन भी क्रमश दृढ होता जाता है। और उससे साधक साधनमार्ग मे और भी अध्यवसायशील होता जाता है। अनवस्थितत्व—साधन करते-करते देखोगे कि कुछ दिन या कुछ सप्ताह तो मन अनायास ही एकाग्र और स्थिर हो जाता है, उस समय ऐसा मालूम होगा कि तुम साधनमार्ग मे बहुत शीघ्र उन्नति कर रहे हो। अचानक एक दिन देखोगे कि तुम्हारा यह उन्नति-स्रोत बन्द हो गया है, मानो जहाज दलदल में फँस गया हो। पर उससे कही हताश मत हो जाना, अध्यवसाय मत खो बैठना। लगे रहो। इस प्रकार उत्थान और पतन मे से होते हुए ही उन्नति होती है।
दुःखदौर्मनस्यांगमेजयत्वश्वासप्रश्वासा विक्षेपसहभुवः ॥३१॥
सूत्रार्थ—दुःख, मन खराब होना, शरीर हिलना, अनियमित श्वास-प्रश्वास—ये सब (चित्त के) विक्षेपों के साथ-साथ उत्पन्न होते हैं।
व्याख्या—जब कभी एकाग्रता का अभ्यास किया जाता है, तभी मन और शरीर पूर्ण स्थिरभाव धारण करते हैं। जब साधना ठीक तरीके से नही होती, अथवा जब चित पर्याप्त सयत नही रहता, तभी ये सब विघ्न आ उपस्थित होते हैं। ओकार के जप और ईश्वर के प्रति आत्मसमर्पण से मन दृढ होता है तथा नया वल प्राप्त होता है। साधनमार्ग में ऐसी स्नायविक चंचलता प्राय सभी को आती है। उधर तनिक भी ध्यान न दे साधना करते रहो। साधना से ही वे सब चले जायेंगे, और तब आसन स्थिर हो जायगा।