राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
Page 279 of 307
Read in context२६२ | राजयोग
पूर्णता ही अभिव्यक्ति में आ जा रही है। हमारे अन्दर यह पूर्णतारूप अनन्त तरङ्गराशि आगे को प्रवाहित करने के लिए प्रयत्न कर रही है। ये सङ्घर्ष और होड़ केवल हमारे अज्ञान के फल हैं। ये इसलिए होते हैं कि हम यह नहीं जानते कि यह दरवाजा कैसे खोला जाय और पानी भीतर कैसे लाया जाय। हमारे पीछे जो अनन्त तरङ्गराशि है, वह अपने को प्रकाशित करेगी ही। वही समस्त अभिव्यक्ति का कारण है। केवल जीवन-धारण या इन्द्रियों को तृप्तार्थ करने की चेष्टा उस अभिव्यक्ति का कारण नहीं है। ये सब संघर्ष तो वास्तव में क्षणिक हैं, अनावश्यक हैं, बाह्य व्यापार मात्र हैं। ये सब अज्ञान से पैदा हुए हैं। सारी होड़ बन्द हो जाने पर भी, जब तक हममें से प्रत्येक व्यक्ति पूर्ण नहीं हो जाता, तब तक हमारे भीतर निहित यह पूर्णस्वभाव हमें क्रमशः उन्नति की ओर अग्रसर कराता रहेगा। अतः यह विश्वास करने का कोई कारण नहीं कि होड़ या प्रतियोगिता उन्नति के लिए आवश्यक है। पशु के भीतर मनुष्य गूढ़भाव से निहित है, ज्योंही किवाड़ खोल दिया जाता है, अर्थात् ज्योंही बाधा हट जाती है, त्योंही वह मनुष्य प्रकाशित हो जाता है। इसी प्रकार, मनुष्य के भीतर भी देवता गूढ़भाव से विद्यमान है, केवल अज्ञान का आवरण उसे प्रकाशित नहीं होने देता। जब ज्ञान इस आवरण को चीर डालता है, तब भीतर का वह देवता प्रकाशित हो जाता है।
निर्माणचित्तान्यस्मितामात्रात् ॥४॥
सूत्रार्थ—बनाए हुए चित्त केवल अस्मिता (अहं-तत्त्व) से होते हैं।