राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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हेतु, फल, आश्रय और विषय नष्ट कर दिए जा सके, तभी उसका समूल विनाश हो सकता है।
अतीतानागतं स्वरूपतोऽस्त्यध्वभेदाद्धर्माणाम् ॥१२॥
**सूत्रार्थ—**वस्तु के धर्म विभिन्न रूप धारण कर सब कुछ हुए है, इसलिए अतीत और अनागत (भविष्य) स्वरूपतः विद्यमान हैं।
**व्याख्या—**तात्पर्य यह है कि असत् से कभी सत् की उत्पत्ति नहीं होती। अतीत और अनागत यद्यपि व्यक्त रूप से नहीं रहते, फिर भी वे सूक्ष्म अवस्था मे रहते हैं।
ते व्यक्तसूक्ष्मा गुणात्मानः ॥१३॥
**सूत्रार्थ—**वे (धर्म) कभी व्यक्त अवस्था में रहते हैं, फिर कभी सूक्ष्म अवस्था में चले जाते हैं, और गुण ही उनकी आत्मा अर्थात् स्वरूप हैं।
**व्याख्या—**गुण का तात्पर्य है सत्त्व, रज और तम—ये तीन पदार्थ। उनकी स्थूल अवस्था ही यह परिदृश्यमान जगत् है। भूत और भविष्य इन तीन गुणो के ही विभिन्न प्रकाश से उत्पन्न होते हैं।
परिणामैकत्वाद्वस्तुतत्त्वम् ॥१४॥
**सूत्रार्थ—**परिणाम में एकत्व रहने के कारण वस्तु वास्तव में एक है।
**व्याख्या—**यद्यपि वस्तुएँ तीन हैं अर्थात् सत्त्व, रज और तम, फिर भी उनके परिणामो में एक पारस्परिक सम्बन्ध रहने के कारण सभी वस्तुओ मे एकत्व है, ऐसा समझना चाहिए।
वस्तुसाम्ये चित्तभेदात्तयोर्विभक्तः पन्थाः ॥१५॥
**सूत्रार्थ—**वस्तु के एक होने पर भी, चित्त भिन्न-भिन्न होने के कारण, विभिन्न प्रकार की वासनाएँ और अनुभूतियां होती हैं।
**व्याख्या—**तात्पर्य यह कि मन से स्वतन्त्र, बाह्य जगत् का