राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextपातंजल-योगसूत्र-४ [२७१]
न तत् स्वाभासं दृश्यत्वात् ॥१९॥
सूत्रार्थ— चित्त दृश्य होने के कारण स्वप्रकाश नहीं है।
व्याख्या— प्रकृति में सर्वत्र महाशक्ति की अभिव्यक्ति देखी जाती है, किन्तु वह स्वप्रकाश नहीं है, स्वभाव से चैतन्य-स्वरूप नहीं है। केवल पुरुष ही स्वप्रकाश है, उसके प्रकाश से ही प्रत्येक वस्तु उद्भासित हो रही है। उसी की शक्ति समस्त जड़ पदार्थ और शक्ति के भीतर से प्रकाशित हो रही है।
एकसमये चोभयानवधारणम् ॥२०॥
सूत्रार्थ— एक समय में दो वस्तुओं को समझ न सकने के कारण चित्त स्वप्रकाश नहीं है।
व्याख्या— यदि चित्त स्वप्रकाश होता, तो वह एक साथ ही सब कुछ अनुभव कर सकता। पर वह तो ऐसा नहीं कर सकता। यदि एक वस्तु में गम्भीर मनोनिवेश करो, तो साथ ही दूसरी वस्तु में मनोनिवेश न कर सकोगे। यदि मन स्वप्रकाश होता, तो वह कितनी अनुभूतियाँ एक साथ कर सकता, इसकी कोई सीमा नहीं। पुरुष क्षणभर में समस्त अनुभव कर सकता है, इसलिए पुरुष स्वप्रकाश है। *
चित्तान्तरदृश्ये बुद्धिबुद्धेरतिप्रसंगः स्मृतिसंकरश्च ॥२१॥
सूत्रार्थ— एक चित्त को दूसरे चित्त का दृश्य मान लेने पर वह दूसरा चित्त फिर तीसरे चित्त का दृश्य होगा—इस प्रकार अनवस्था प्राप्त होगी और स्मृति का भी मिश्रण हो जायगा।
व्याख्या— मान लो, एक दूसरा चित्त है, जो इस पहले
* इस सूत्र का टीकासम्मत अर्थ यह है कि चित्त एक ही समय में अपना और अपने विषयों का अनुभव न कर सकने के कारण स्वप्रकाश नहीं है, पुरुष ही स्वप्रकाश है।