राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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राजयोग
तच्छिद्रेषु प्रत्ययान्तराणि संस्कारेभ्यः ॥ २७ ॥
**सूत्रार्थ—**उसके विघ्नस्वरूप बीच-बीच में जो अन्यान्य ज्ञान उत्पन्न होते हैं, वे सस्कारो से आते हैं।
व्याख्या—'हमें सुखी करने के लिए कोई बाहरी वस्तु आवश्यक हैं', ऐसा विश्वास पैदा करनेवाले जो सब भाव हममे उठते हैं, वे सिद्धिलाभ मे बाधक हैं। पुरुष स्वभाव से सुखस्वरूप और आनन्दस्वरूप है। पर यह ज्ञान पूर्व सस्कारों से ढका हुआ है। इन सब सस्कारो का क्षय होना आवश्यक है।
हानमेषां क्लेशवदुक्तम् ॥ २८ ॥
**सूत्रार्थ—**जिन उपायो से क्लेशो के नाश की बात (योग०२।१०) कही गई है, इन (सस्कारो) को भी ठीक उन्हीं उपायो से नष्ट करना होगा।
प्रसंख्यानेऽप्यकुसीदस्य सर्वथा विवेकख्यातेर्धर्ममेघ. समाधिः ॥ २९ ॥
**सूत्रार्थ—**तत्त्वो के विवेकज्ञान से उत्पन्न ऐश्वर्य में भी जिनका वैराग्य हो जाता है, उनका विवेकज्ञान सर्वथा प्रकाशमान रहने के कारण उन्हें धर्ममेघ समाधि प्राप्त हो जाती है।
**व्याख्या—**जब योगी इस विवेकज्ञान को प्राप्त कर लेते हैं, तब उनके पास पूर्व अध्याय में बतलाई गई सिद्धियाँ आती हैं, पर सच्चे योगी इन सबका परित्याग कर देते हैं। उनके पास धर्ममेघ नामक एक विशेष प्रकार का ज्ञान, एक विशेष प्रकार का आलोक आता है। इतिहास ने ससार के जिन सब महान् धर्माचार्यों का वर्णन किया है, उन सभी को यह धर्ममेघ समाधि हुई थी। उन्होने ज्ञान का मूल स्रोत अपने भीतर ही पाया था। सत्य उनके निकट अत्यन्त स्पष्ट रूप से प्रकाशित हुआ था। पूर्वोक्त सिद्धियो का अभिमान छोड़ देने के कारण