राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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मिलेंगे, और तब साधना के लिए तुम्हारा उत्साह बड़ जायगा। योगशास्त्र के एक टीकाकार ने कहा भी है, "योगशास्त्र की सत्यता के सम्बन्ध मे यदि एक बिलकुल सामान्य प्रमाण भी मिल जाय, तो उतने से ही सम्पूर्ण योगशास्त्र पर विश्वास हो जायगा।" उदाहरणस्वरूप तुम देखोगे कि कुछ महीनो की साधना के वाद तुम दूसरो का मनोभाव समझ सक रहे हो, वे तुम्हारे पास तस्वीर के रूप में आयेंगे, यदि बहुत दूर पर कोई शब्द या बातचीत हो रही हो, तो मन एकाग्र करके सुनने की चेष्टा करने से ही तुम उसे सुन लोगे। पहले पहल अवश्य ये व्यापार बहुत थोडा-थोडा करके दिखेंगे। परन्तु उसी से तुम्हारा विश्वास, बल और आशा बढती रहेगी। मान लो, नासिका के अग्रभाग मे तुम चित्त का सयम करने लगे, तब तो थोडे ही दिनो मे तुम्हे दिव्य सुगन्ध मिलने लगेगी, इसी से तुम समझ जाओगे कि हमारा मन कभी-कभी वस्तु के प्रत्यक्ष सस्पर्श मे न आकर भी उसका अनुभव कर लेता है। पर यह हमे सदा याद रखना चाहिए कि इन सिद्धियो का और कोई स्वतन्त्र मूल्य नही, वे हमारे प्रकृत उद्देश्य के साधन में कुछ सहायता मात्र करती हैं। हमे याद रखना होगा कि इन सब साधनो का एकमात्र लक्ष्य, एकमात्र उद्देश्य 'आत्मा की मुक्ति' है। प्रकृति को पूर्ण रूप से अपने अधीन कर लेना ही हमारा एकमात्र लक्ष्य है। इसके सिवा और कुछ भी हमारा प्रकृत लक्ष्य नही हो सकता। मामूली सिद्धियों से सन्तुष्ट हो गए, तो पूरा न पडेगा। हम ही प्रकृति पर प्रभुत्व करेंगे, प्रकृति को अपने ऊपर प्रभुत्व न करने देगे। शरीर या मन कुछ भी हम पर प्रभुत्व न कर सके। हम यह कभी न भूले कि 'शरीर हमारा है'—'हम शरीर के नही'।