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राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

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३८ राजयोग

प्रकार की शक्तियो का विकास हुआ है, उनकी समष्टि चिरकाल समान रहती है, वे शक्तियाँ कल्प के अन्त मे शान्तभाव धारण करती है—अव्यक्त अवस्था मे गमन करती है, और दूसरे कल्प के आदि मे वे ही फिर से व्यक्त होकर आकाश पर कार्य करती रहती है। इसी आकाश से परिदृश्यमान साकार वस्तुएँ उत्पन्न होती हैं, और आकाश के परिणाम-प्राप्त होने पर यह प्राण भी नाना प्रकार की शक्तियो मे परिणत होता रहता है। इस प्राण के यथार्थ तत्त्व को जानना और उसको सयत करने की चेष्टा करना ही प्राणायाम का प्रकृत अर्थ है।

इस प्राणायाम मे सिद्ध होने पर हमारे लिए मानो अनन्त शक्ति का द्वार खुल जाता है। मान लो, किसी व्यक्ति की समझ मे यह प्राण का विषय पूरी तरह आ गया और वह उस पर विजय प्राप्त करने मे भी कृतकार्य हो गया, तो फिर ससार में ऐसी कौनसी शक्ति है, जो उसके अधिकार मे न आए ? उसकी आज्ञा से चन्द्र-सूर्य अपनी जगह से हिलने लगते है, क्षुद्रतम परमाणु से बृहत्तम सूर्य तक सभी उसके वशीभूत हो जाते है, क्योकि उसने प्राण को जीत लिया है। प्रकृति को वशीभूत करने की शक्ति प्राप्त करना ही प्राणायाम की साधना का लक्ष्य है। जब योगी सिद्ध हो जाते है, तब प्रकृति मे ऐसी कोई वस्तु नही, जो उनके वश मे न आ जाय। यदि वे देवताओ का आह्वान करेगे, तो वे उनकी आज्ञामात्र से आ उपस्थित होगे, यदि मृत व्यक्तियो को आने की आज्ञा देगे, तो वे तुरन्त हाजिर हो जायेंगे। प्रकृति की समुदाय शक्ति उनकी आज्ञा से दासी की तरह काम करने लगेगी। अज्ञ जन योगी के इन कार्यकलापो को अलौकिक समझते है। हिंदुओ का यह एक विशेषत्व है कि वे