BharatKosha
राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)

Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras

by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि

DevanagariHindipublished307 pages

Page 67 of 307

Read in context
Page 67

५२ राजयोग

प्राण के अभाव को पूरा करने मे भी समर्थ हो जायगा । इस प्रकार प्राणायाम के अनेक अग हैं। इनको धीरे-धीरे, एक के बाद एक, सीखना होगा । अतएव यह स्पष्ट है कि विभिन्न रूपो में प्रकाशित प्राण का सयम करना और उसको विभिन्न प्रकार से चलाना ही राजयोग का एकमात्र लक्ष्य है। जब कोई अपनी समुदय शक्तियो का सयम करता है, तब वह अपनी देह के भीतर के प्राण का ही सयम करता है। जब कोई ध्यान करता है, तो भी समझना चाहिए कि वह प्राण का ही सयम कर रहा है।'

महासागर की ओर यदि देखो, तो प्रतीत होगा कि वहाँ पर्वतकाय बडी-बडी तरगें हैं, फिर छोटी-छोटी तरगें भी हैं, और छोटे-छोटे बुलबुले भी। पर इन सबके पीछे वही अनन्त महा-समुद्र है। एक ओर वह छोटा बुलबुला अनन्त समुद्र से युक्त है, फिर दूसरी ओर वह बडी तरंग भी उसी महासमुद्र से युक्त है। इसी प्रकार, ससार मे कोई महापुरुष हो सकता है, और कोई छोटा बुलबुला-जैसा सामान्य व्यक्ति, परन्तु सभी उसी अनन्त महाशक्ति-समुद्र से युक्त हैं। इस महाशक्ति से जीव का जन्मगत सम्बन्ध है। जहाँ भी जीवनी-शक्ति का प्रकाश देखो, वहाँ समझना कि उसके पीछे अनन्त शक्ति का भण्डार है। एक छोटासा फफूँदी (कुकुरमुत्ता) है, वह, सम्भव है, इतना छोटा, इतना सूक्ष्म हो कि उसे अनुवीक्षण यन्त्र द्वारा देखना पडे, उससे आरम्भ करो। देखोगे कि वह अनन्त शक्ति के भण्डार से क्रमश शक्ति सग्रह करके एक अन्य रूप धारण कर रहा है। कालान्तर में वह उद्भिद् के रूप मे परिणत होता है, वही फिर एक पशु का आकार ग्रहण करता है, फिर मनुष्य का रूप लेकर वही अन्त में ईश्वर-रूप में परिणत हो जाता है। हाँ, इतना अवश्य है कि

राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित) · Page 67 of 307 · BharatKosha