राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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Read in contextअध्यात्म प्राण का संयम ७१
बाई नासिका तर्जनी से बन्द करके दाहिनी नाक से धीरे-धीरे वायु-पूरण करो और फिर पहले की तरह दोनो नासिका-छिद्रो को बन्द कर लो। हिन्दुओं के समान प्राणायाम का अभ्यास करना इस देश (अमेरिका) के लिए कठिन होगा, क्योकि हिन्दू बाल्यकाल से ही इसका अभ्यास करते हैं, उनके फेफडे इसके अभ्यस्त हैं। यहाँ चार सेकन्ड से आरम्भ करके धीरे-धीरे बढाने पर अच्छा होगा। चार सेकन्ड तक वायु-पूरण करो, सोलह सेकन्ड बन्द करो और फिर आठ सेकन्ड में वायु का रेचन करो। इससे एक प्राणायाम होगा। पर उस समय मूलाधारस्थ त्रिकोणाकार पद्म पर मन स्थिर करना भूल न जाना। इस प्रकार की कल्पना से तुमको साधना मे बडी सहायता मिलेगी। एक तीसरे प्रकार का प्राणायाम यह है — धीरे-धीरे भीतर श्वास खींचो, फिर तनिक भी देर किए बिना धीरे-धीरे वायु रेचन करके बाहर ही श्वास कुछ देर के लिए रुद्ध कर रखो, संख्या पहले की प्राणायाम की तरह है। पूर्वोक्त प्राणायाम और इसमें भेद इतना ही है कि पहले के प्राणायाम में सांस भीतर रोकनी पडती है और यहाँ बाहर। यह प्राणायाम पहले से सीधा है। जिस प्राणायाम मे साँस भीतर रोकनी पड़ती है, उसका अधिक अभ्यास अच्छा नही। उसका सबेरे चार बार और शाम को चार बार अभ्यास करो। बाद में धीरे-धीरे समय और संख्या बढा सकते हो। तुम क्रमश देखोगे कि तुम बहुत सहज ही यह कर सक रहे हो और इससे तुम्हे बहुत आनन्द भी मिल रहा है। अतएव जब देखो कि तुम यह बहुत सहज ही कर सक रहे हो, तब बडी सावधानी और सतर्कता के साथ सख्या चार से छ बढा सकते हो। अनियमित रूप से साधना करने पर तुम्हारा अनिष्ट हो सकता है।