राजयोग (स्वामी विवेकानन्द - पातञ्जल योगसूत्र भाष्य सहित)
Raja Yoga - Swami Vivekananda with Patanjali Yoga Sutras
by स्वामी विवेकानन्द / महर्षि पतञ्जलि
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व्यक्ति न सुन्दर भाषा बोल सकता है, न सुन्दर ढंग से भाव व्यक्त कर सकता है, परन्तु फिर भी लोग उसकी बात से मुग्ध हो जाते है। ऐसा क्यो ? यह ओज-शक्ति ही शरीर से निकलकर ऐसा अद्भुत कार्य करती है। इस ओज-शक्ति से युक्त पुरुष जो कुछ कार्य करते है, उसी मे महाशक्ति का विकास देखा जाता है। ऐसी है ओज की शक्ति ।
यह ओज, थोडी-बहुत मात्रा मे, सभी मनुष्यो मे विद्यमान है। शरीर मे जितनी शक्तियाँ खेल कर रही है, उनका उच्चतम विकास यह ओज है। यह हमे सदा याद रखना चाहिए कि सवाल केवल परिवर्तन का है—एक ही शक्ति दूसरी शक्ति में परिणत हो जाती है। बाहरी संसार मे जो शक्ति विद्युत् अथवा चुम्बकीय शक्ति के रूप मे प्रकाशित हो रही है, वही क्रमश आभ्यन्तरिक शक्ति मे परिणत हो जायगी। आज जो शक्तियाँ पेशियो मे कार्य कर रही है, वे ही कल ओज के रूप मे परिणत हो जायँगी। योगी कहते हैं कि मनुष्य मे जो शक्ति काम-क्रिया-काम-चिन्तन आदि रूपो मे प्रकाशित हो रही है, उसका दमन करने पर वह सहज ही ओजधातु मे परिणत हो जाती है। और हमारे शरीर का सबसे नीचेवाला केन्द्र ही इस शक्ति का नियामक होने के कारण योगी इसकी ओर विशेष रूप से ध्यान देते हैं। वे सारी काम-शक्ति को लेकर ओजधातु में परिणत करने का प्रयत्न करते हैं। कामजयी स्त्री-पुरुष ही इस ओजधातु को मस्तिष्क में संचित कर सकते हैं। इसीलिए सब देशो मे ब्रह्मचर्य सर्वश्रेष्ठ धर्म माना गया है। मनुष्य सहज ही अनुभव करता है कि काम को प्रश्रय देने पर सारा धर्मभाव, चरित्र-बल और मानसिक तेज जाता रहता है। इसी कारण, देखोगे, संसार में