रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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गुरुओं के प्रति भी परम श्रद्धा प्रकट करता हूं, क्यों कि आप लोगों के सदुपदेश तथा प्रोत्साहन का ही फल है कि मैं इस टीका के लिखने में सफल हुआ।
आयुर्वेद प्रेमी तथा छात्रों के हितचिन्तक और सरस्वतीसेवापरायण परम वैष्णवभक्त चौखम्बा पुस्तकालय के अध्यक्ष श्रीमान् जयकृष्णदास जी को मैं अनेक धन्यवाद देता हूं, क्यों कि आपने अपने उदारभावसे तथा सरस्वती की सेवा और आयुर्वेद की उन्नति तथा छात्रों के हित आदि अनेक विषयों का विचार रखकर आयुर्वेद ग्रन्थों के प्रकाशन की सदिच्छा प्रगट की तथा अब दिनों दिन प्रत्यक्ष रूप में प्रगट भी हो रही है, इस ग्रन्थ के प्रकाशन में तन, मन, धन सब कुछ व्यय करके इस कार्य को पूर्ण किया। अन्त में मैं इस ग्रन्थ के प्रारम्भिक प्रूफ संशोधन में पं० रामचन्द्र पराशीकरजी ने अपना समय दिया अतः उन्हें धन्यवाद देता हूं।
ग्रन्थ की छपाई का कार्य बहुत ही शीघ्रता से हुआ है इसलिये अनेक स्थानों पर अत्यन्त ध्यान देने पर भी सम्भव है अशुद्धियां रह गई हों तो पाठक क्षमा करें, आगामी संस्करण में सब ठीक कर दी जायगीं। इस टीका से यदि वैद्यक शास्त्र तथा वैद्यसमुदाय का स्वल्प भी उपकार हुआ तो मैं अपने श्रम को सफल समझूंगा।
गच्छतः स्खलनं क्वापि भवत्येव प्रमादतः।
हसन्ति दुर्जनास्तत्र समादधति सज्जनाः ॥
सारं ततो ग्राह्यमपास्य फल्गु
हंसो यथा क्षीरमिवाम्बुमध्यात्।
इति।
| संवत् १९९६<br>ज्येष्ठ शुक्ल<br>पूर्णिमा | निवेदयति-विद्वदनुचरः<br>अम्बिकादत्तशास्त्री<br>आयुर्वेदाचार्य ( A. M. S. )<br>हिन्दू विश्वविद्यालय<br>आयुर्वेदकालेज, काशी |
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