रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)
Rasaratna Samuchchaya Hindi
by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)
Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)
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Read in contextनवमोऽध्यायः । २५१
तक अग्नि देना चाहिए । तीसरे दिन के पश्चात् उष्ण चूल्हे पर गरम जल में यन्त्र को रख कर खोलना चाहिए । यंत्र को शीतल करके नहीं खोलें। इसी क्रम से पारद के साथ गन्धक का जारण करना चाहिए । यह जारणयंत्र का दूसरा स्वरूप है ॥ १९-२३ ॥
अथ विद्याधरयन्त्रम्— यन्त्रं विद्याधरं ज्ञेयं स्थालीद्वितयसम्पुटात् । चुल्लीं चतुर्मुखीं कृत्वा यन्त्रभाण्डं निवेशयेत् ॥ २४ ॥ तत्रौषधं विनिक्षिप्य निरुन्ध्याद्भाण्डकाननम् । यन्त्रं विद्याधरं नाम तन्त्रज्ञैः परिकीर्त्तितम् ॥ २५ ॥
दो मिट्टी की स्थालियों को परस्पर कपड़मिट्टी द्वारा बन्द करने की क्रिया को विद्याधर यंत्र कहते हैं। विधि-एक चार मुख वाला चूल्हा बना कर उस पर औषधादिक से भरा हुआ एक मिट्टी का भाण्ड रखना चाहिए, फिर इस भाण्ड पर एक दूसरा भाण्ड रखकर नीचे के भाण्ड के मुख को ऊपर रखे हुए भाण्ड के तल के साथ कपड़मिट्टी द्वारा बन्दकर देते हैं, फिर अग्नि जलाते हैं। इसको रसशास्त्र के पण्डितों ने विद्याधरयंत्र कहा है ॥ २४-२५ ॥
अथ सोमानलयन्त्रम्— ऊर्ध्वं वह्निरधश्चापो मध्ये तु रससङ्ग्रहः । सोमानलमिदं प्रोक्तं जारयेद्गगनादिकम् ॥ २६ ॥
एक स्थाली के अन्दर जल भर कर उसमें पारद से युक्त मूषा रखकर उस स्थाली के मुख को शराव से बन्द करके कपड़मिट्टी कर देते हैं । पश्चात् उस शराव पर उपलों की आँच देते हैं, इस यंत्र को सोमानल यंत्र कहते हैं। क्यों के नीचे सोम (जल) भरा रहता है, बीच में मूषा के अन्दर रस का संग्रह रहता है, ऊपर अग्नि जलाते हैं अतः इसका नाम सोमानल यंत्र है। पारद के साथ मूषा में अभ्रक आदि रखकर इससे जारण करते हैं ॥ २६ ॥
अथ गर्भयन्त्रम्— गर्भयन्त्रं प्रवक्ष्यामि पिष्टिकाभस्मकारकम् । चतुरङ्गुलदीर्घाञ्च त्र्यङ्गुलोन्मितविस्तराम् ॥ २७ ॥ मृण्मयीं सुदृढां मूषां वर्तुलां कारयेन्मुखम् ।