BharatKosha
रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

रसरत्नसमुच्चय (सुरत्नोज्ज्वला हिन्दी व्याख्या सहित)

Rasaratna Samuchchaya Hindi

by रस-वाग्भटाचार्य (टीकाकार: पं. अम्बिकादत्त शास्त्री)

Source: Rasaratna Samuchchaya with Suratnojjvala Hindi Commentary by Pt. Ambika Datta Shastri (1939) (origin)

DevanagariHindipublished362 pages

Page 355 of 362

Read in context
Page 355

.दशमोऽध्यायः। २६५

जो पारद आदि के दोषों को नष्ट करे उसको मूषा कहते हैं ॥ २ ॥

मूषाया उपादानम् ।
उपादानं भवेत्तस्या मृत्तिका लोहमेव च ॥ ३ ॥
मूषा का निर्माण लोह और मृत्तिका से होता है ॥ ३ ॥

अथ मूषाप्रशंसा—
मूषा मुखविनिष्क्रान्ता वरमेकापि काकिणी ।
दुर्जनप्रणिपातेन धिगलक्षमपि मानिनाम् ॥ ४ ॥
मूषा के मुख से निकाली हुई (भस्म होकर) एक कोड़ी भी उत्तम है किन्तु दुर्जन की बन्दना करने से प्राप्त हुए लक्ष रुपये भी मानियों के लिये हेय हैं ॥४॥

विमर्श—काकिणीशब्द की चर्चा भिन्न २ शास्त्रों में इस तरह है 'वराटकानां दशकद्वयं तत् साकाकिणी' इति लीलावती । 'पणगण्डकयोस्तुल्ये उदमानस्य काकिणी, इति रुद्रोक्तिः। काकिणी पणतुर्यांशे मानदण्डेऽपि दृश्यते। कृष्णलैकवराटयोः स्यादुन्मानल्यांशकेऽपिच ॥ इति मेदिनी ।

सन्धिलपस्य पर्यायाः—
मूषापिधानयोर्बन्धे बन्धनं सन्धिलपनम् ।
अन्ध्रणं रन्ध्रणं चैव संश्लिष्टं सन्धिवन्धनम् ॥ ५ ॥
मूषा और उसके आच्छादन करने के ढक्कन की सन्धियों को बन्द करने में 'बन्धन, सन्धिलपन, अन्ध्रण, रन्ध्रण, संश्लिष्ट और सन्धिवन्धन इतने शब्द प्रयुक्त होते हैं ॥ ५ ॥

अथ मूषोपयुक्तमृत्तिका
मृत्तिका पाण्डुरस्थूला शर्करा शोणपाण्डुरा ।
चिराध्मानसहा सा हि मूषार्थमतिशस्यते ॥
तदभावे च वाल्मीकी कौलाली वा समीर्यते ॥ ६ ॥
मूषा बनाने के लिये जो मिट्टी लेते हैं वह पीली और मोटी (ज्यादा महीन न हो) या लाल और पाण्डु वर्ण की तथा रेत जिसमें मिली हो और जो बहुत देर तक तेज आँच को फूंकने से भी फटे नहीं ऐसी होनी चाहिए । इस तरह की मृत्तिका मूषानिर्माण करने के लिये अत्यन्त श्रेष्ठ है। यदि उपर्युक्त लक्षणों वाली योग्य मिट्टी नहीं मिले तो उसके स्थान में दीमक अथवा कुम्हार के कार्य में आने वाली मिट्टी लेना चाहिए ॥ ६ ॥