Skip to content
BharatKosha
रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

Page 135 of 799

Read in context
Page 135

अस्याद्यः प्रकारः—भूर्जपत्रे निघाय पारदं पोट्टलीकृत्य ससैन्धवे जले दोलया सप्तदिनं स्वदयेत् इति ॥ ८२-८४ ॥ भा. टी.—पूर्वोक्त पातनादि संस्कारयुक्त पारद को भोजपत्र में रख कपड़े की पोटली में बाँधे, अथ दोलायन्त्र में सैन्धानमक तथा जल डालकर इसमें पारद की पोटली को मन्द-मन्द अग्नि से पकायें । इस प्रकार से स्वेदित पारद पुनः पुष्ट होकर नपुंसकता दोष से रहित हो जाता है ॥ ८२-८३ ॥ एक काँच की शीशी में पारद, सैन्धानमक तथा जल भर इसको बन्द करके जमीन के अन्दर तीन दिन तक गाड़ देने से भी इसका क्लीबत्व-दोष दूर हो जाता है ॥ ८४ ॥ तृतीयः प्रकारः सैन्धवेनाम्लपिष्टेन रसेन्द्रं कूपिकागतम् । गर्ते निधाय चोध्वँन्तु देयो लघुपुटो बुधैः ॥८५॥ एवं सम्पुटितः शीघ्रं भृशमाप्यायते रसः । जातीवीर्यप्रकर्षश्च षण्ढभावं विमुञ्चति ॥८६॥ तृतीयः प्रकारः—अम्लपिष्टेन सैन्धवेन सह पारदं काचकुप्यां निधायोपरि लावकाख्यपुटदानम्, फलञ्च पूर्ववत्, शीघ्रतायां विशेषः ॥ ८५-८६ ॥ भा. टी.—सैन्धानमक को काञ्जी या नींबू के रस से पीसकर इसके साथ पारद मिलाकर इन सबको काँच की शीशी में बन्दकर एक गढ़े में गाड़कर इसके ऊपर पूर्वोक्त लावपुट देने से भी इसका षण्ढदोष नष्ट होकर वीर्यप्रकर्षता बढ़ जाती है ॥ ८५-८६ ॥ नियामनस्वरूपम् बोधनाल्लब्धवीर्यस्य रसस्य स्वेदनं हि यत् । चापल्यविनिवृत्त्यर्थं तन्नियामनमीरितम् ॥८७॥ नियामनलक्षणं सफलमाह—बोधनादिति ॥ ८७ ॥ भा. टी.—बोधन संस्कार द्वारा लब्धवीर्य पारद के चापल्य दोष को दूर करने के लिए पारद को जो निम्न विधि से स्वेदन किया जाता है उस कर्म को नियामनसंस्कार कहते हैं ॥ ८७ ॥ नियामनस्य प्रथमः प्रकारः अम्लिकानागिनीभृंगवन्ध्याऽब्दकितवोद्भवैः । रसैः संस्वेदितः सूतो नियतं नियतो भवेत् ॥८८॥