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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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१४२ | रसतरङ्गिणी

भा.टी.—उक्त विधि से बना हुआ रससिन्दूर प्रमेह रूपी हाथी के लिये सिंह समान नाशक है । प्रबल शूल को समूल नष्ट करता है । इसके कुछ दिन प्रयोग से भगंदर नष्ट हो जाता है और यह महाज्वर रूपी हाथी के लिये अंकुश का काम करता है । यह रससिन्दूर शरीर के सब रोगों को नष्ट कर देता है । सब प्रकार के शोथ ( क्षय ) को सुखानेवाला है । स्वस्थ शरीर में अत्यन्त आनन्द का अनुभव करता है । शरीर में कामोद्दीपन करनेवाली अनेक प्रकार की कामोद्दीपक औषधियाँ, तथा विहार आदि यह सब रससिन्दूर के सामने व्यर्थ समझने चाहिये । यह रससिन्दूर गुल्मरोगहर रमणेच्छा प्रवर्तक है । राजयक्ष्मा रूपी हाथी के लिये सिंह के समान घातक है । पाण्डुरोग, स्थूलता को दूर करता है । व्रण, शरीर की रूक्षता तथा अग्निमान्द्य को दूर करता है । कुष्ठ रोगों को नष्ट करता तथा रतिकला में चतुर स्त्री को प्रसन्नता देनेवाला है । रससिंदूर प्राणादि भेद से पाँच प्रकार के वायुओं का नियमन करता है जिससे वायु समभाव में होकर धमनियों की अपनी क्रिया ( रक्तप्रसरण क्रिया ) ठीक होती है । इसके सेवन से वातनाड़ियों ( Nerve ) का कालसमुदाय दृढ़ ( स्वकार्यक्षम ) होता है । इसी कारण रससिन्दूर सेवन करने वालों का मन सदा प्रसन्न तथा स्वस्थ रहता है । रससिन्दूर के नियमपूर्वक योग्य अनुपात के साथ सेवन करने से मल रूप में शरीर से बाहर निकलने वाले मल-मूत्र तथा अपानवायु बिना कष्ट के बाहर निकलते रहते हैं और शरीर शुद्ध रहता है । यह पित्त को बाहर निकालता है, परन्तु दस्त (पतला) नहीं लाता है और पित्ताशय अथवा कोष्ठ में किसी प्रकार का क्षोभ नहीं पैदा करता है । इसके अतिरिक्त चिरकाल तक सेवन करने पर भी केवल पारद अथवा निर्गन्ध पारद योगों के समान, दाँतों के मसूड़ों में शोथ, मुखपाक, व्रण, लालास्राव तथा प्रदाहविकार उत्पन्न नहीं करता है, इस प्रकार अन्यान्य केवल पारद योग भक्षण से होने वाले कोई भी विकार रससिन्दूर के सेवन से नहीं होते हैं । इसके विधिपूर्वक सेवन करने से शरीर में अत्यन्त बढ़े हुए वातादि दोष शान्त हो जाते हैं और सब इन्द्रियों का अपने विषय-ग्रहण रूपी व्यापार भी यथावत् होता रहता है ॥ १४०-१५८ ॥ अथ सहपानस्य लक्षणम् यद्योगेन रसादीनां विभक्ताः परमाणवः ।