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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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१८६ रसतरङ्गिणी प्रतिदिन एक बार शुद्ध गन्धक को हरीतकी अथवा त्रिफला कषाय के साथ सेवन कराने से उत्तम लाभ होता है। नेत्रों की निर्बलता तथा स्थायी नेत्र रोगों के लिये तीन मासा त्रिफलाचूर्ण, दो रत्ती शुद्धगन्धक को मधु और घृत में मिला- कर कुछ काल तक निरन्तर सेवन करने से लाभ होता है। यदि इसमें भाँगरे का स्वरस अनुपान के रूप में पिया जाय तो विशेष गुणकारी हो जाता है। दद्रुविद्रावणमलहरः सिक्थतैलं तु विमलं भानुतोलकसंमितम् । विशोधितं गन्धकं च तोलकैकमितं शुभम् ॥ ५६ ॥ सुपुष्पितं तु सौभाग्यं चक्रमर्दस्य बीजकम् । वृक्षामयरजः स्वच्छं तोलकार्द्धमितं पृथक् ॥ ६० ॥ अतिमन्दाग्निना पक्वं शीतं कुप्यां तु विन्यसेत् । मतो मलहरोऽयं तु दद्रुविद्रावणाव्हयः ॥ ६१ ॥ प्रलिप्तोऽयं मलहरो दिनसप्तकमात्रतः । उन्मूलयति दद्रूणि समूलं नेह संशयः ॥ ६२ ॥ भानुतोलकसंमितमिति द्वादशतोलकपरिमितम् । वृक्षामयः लाक्षा, तस्य रजश्चूर्णम् ॥ ५६–६२ ॥ भा.टी.—सिक्थतैल बारह तोला, शुद्ध गन्धक एक तोला, सुहागे की खील, चकवड़ के बीज, लाक्षाचूर्ण, प्रत्येक आधा-आधा तोला लेकर सबको एक कलई किये हुये पात्र में डालकर मन्द-मन्द अग्नि से पकाकर ठंडा होने पर शीशी में भर लें। इसको दद्रुनाशक मलहर कहते हैं। यह दाद के ऊपर सात दिन मलने से उसको जड़ से नष्ट कर देता है ॥ ५६–६२ ॥ गन्धकाद्यमलहरः सिक्थतैलं सुविमलं रसतोलकसंमितम् । गन्धकं गिरिसिन्दूरं तोलकार्द्धमितं पृथक् ॥ ६३ ॥ टङ्कणं घनसारं च पृथक माषद्वयोन्मितम् । दत्वा संमेल्य यत्नेन काचकुप्यां निधापयेत् ॥ ६४ ॥ मतो मलहरोऽयं तु गन्धकाद्यसमाह्वयः । विनाशयत्याशु भृशं पामामत्यर्थदारुणाम् ॥ ६५ ॥ रसतोलकसंमितमिति षट्तोलकाः सिक्थतैलस्य। घनसारं कर्पूरम् ॥६३–६५॥ भा.टी.—स्वच्छ सिक्थतैल ६ तोला, गन्धक तथा सिन्दूर प्रत्येक आधा-