रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context१६४ रस्तरङ्गिणी ब्रह्मबीजं पलाशबीजम् । स्पष्टमन्यत् । योगोऽयमेव योगरत्नाकरे महाराज- वटीरसनाम्ना व्यवहृतः । सद्यः फलदश्चेति ॥ १०५–१०८ ॥ भा.टी.—ढाक के बीजों का बारीक चूर्ण करके इसको बकरी के दूध में मिलाकर तेज धूप में रखकर सुखा लें । अब इस दूध युक्त पलासबीज चूर्ण में सोलहवां भाग शुद्ध गन्धक मिलाकर एक बोतल या कांच की शीशी में भर दें और इस शीशी को पूर्वोक्त विधि से पाताल यन्त्र में रखकर तेल निकाल लें । यह गन्धक तैल बहुत उत्तम गन्धक के सत्त्व सदृश होता है । दो रत्ती इस गन्धक तैल को पान के पत्ते में रख इसमें एक रत्ती रससिन्दूर मिला अंगुली से खूब रगड़ कर कज्जली बना लें और पान के साथ इस कज्जली का सेवन करें॥१०५-१०८॥ अत्रापथ्यम् अम्लं शाकादिकञ्चैव ककाराष्टकभेषजम् । उष्णवीर्यं यदन्यच्च तदपथ्यमिह संस्मृतम् ॥ १०६ ॥ योगेनानेन पुरुषो वृद्धोऽपि तरुणायते । अपूर्ववत् प्रतिदिनं रमयेद् रमणीशतम् ॥ ११० कासश्वासहरो बल्यो वलीपलितानाशनः । शोषसंशोषकः कामं क्षयकुञ्जरकेशरी ॥ १११ ॥ शूलकालानलः सत्यं मेहवर्गनिषूदनः । एतत्तैलसमं लोके नान्यदस्ति रसायनम् ॥ ११२ ॥ भा.टी.—गन्धक सेवन करनेवाले मनुष्य को अम्ल द्रव्यों के शाक आदि तथा ककाराष्टक द्रव्य तथा और भी जो उष्णवीर्य द्रव्य हैं उनका त्याग करना चाहिये । इस गन्धकतैल योग का सेवन करने से वृद्ध मनुष्य भी तरुण की भाँति हो जाता है, प्रतिदिन सौ स्त्रियों के साथ नवीन रूप में मैथुन करने की शक्तिवाला हो जाता है । इसके अतिरिक्त इस योग के सेवन से कास-श्वास दूर होते हैं, शरीर में बल बढ़ता है और शरीर वली-पलित रहित हो जाता है । यह योग शोष को सुखानेवाला और क्षयरूप हाथी को सिंह की भांति नष्ट करता है । वातिक शूल, तथा सब प्रकार के प्रमेहों को नष्ट करता है । इस तैल के समान संसार में अन्य कोई रसायन नहीं कहा जाता है ॥ १०६–११२ ॥ अथ गन्धकद्रावकस्य निर्माणप्रकारः एकस्मिंल्लोहपात्रे तु बलिं शतपलोन्मितम् । निक्षिप्य चुल्लिकायाञ्च निधायाग्निं प्रदीपयेत्॥ ११३ ॥