रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context२०२ रसतरङ्गिणी भा.टी.—हिंगुल को चूर्ण करके भेड़ के दूध की सात भावना देने से वह शुद्ध हो जाता है। फिर इस मेषीदुग्धभावित हिंगुल को अम्लवर्गोक्त औषधियों के रस से सात भावना देकर सुखा लिया जाय तो यह उत्तम रूप से शुद्ध हो जाता है ॥ १४-१५ ॥ वक्तव्य—भेड़ के दूध में मर्दन करने से हिंगुल में घी का स्नेहांश रह जाता है। इसी को मिटाने के लिये पुनः हिंगुल को अम्लवर्ग से भावना दी जाती है। चतुर्थः शोधनप्रकारः निम्बूकरससेनेह हिङ्गुलं श्लक्ष्णचूर्णितम् । विभावयेत्सप्तवारं क्षालयेद्बहुशोऽम्भसा ॥ १६ ॥ ततः संशोषयेद् घर्मे रसतन्त्रविधानवित् । एवं विशोधितं रक्तं वीतशङ्क प्रयोजयेत् ॥ १७ ॥ चतुर्थे शोधनप्रकारे निम्बूकरससेन पेषणाद् दरदस्थः स्वतन्त्रः पारदो विश्लिष्टो भवत्यातपे शोषणाच्चोड्डीयत इति सोऽयं प्रकारः साधीयान् सिद्धः । स्पष्टमन्यत् ॥ १६-१७ ॥ भा.टी.—हिंगुलचूर्ण को खरल में डालकर नीबूरस के साथ मर्दन करते हुए सात भावना दें। फिर अन्त में इसको जल से अच्छी तरह अम्ल अंश निकलने तक धोकर धूप में सुखा लें। इस प्रकार शुद्ध हिंगुल को निःसंकोच योगों में काम में ला सकते हैं ॥ १६-१७॥ शोधितहिंगुलस्य गुणाः लोचनामयहरः कफापहः पित्तजामयनिषूदनः परम् । प्लीहकुष्ठगरकामलाहरो जाठराग्निजननोऽथ पाचनः ॥ १८ ॥ मेहवर्गपरितापनाशनो देहकान्तिबलवुद्धिवर्द्धनः । आमवातगजदर्पखण्डनो हिंगुलो विजयते ज्वरापहः ॥ १९ ॥ शोधितहिङ्गुलस्य गुणाः—लोचनामयाः नेत्ररोगाः। पित्तजामयाः दाहा- दयः। गरं कृत्रिमविषम् । मेहवर्गपरितापनाशन इति प्रमेहसमूहजनितदुःखवि- नाशी ॥ १८-१९ ॥ भा.टी.—शुद्ध हिंगुल नेत्ररोगहर, कफप्रकोपनाशक, पित्तप्रकोपजन्य-रोग- हर है। यह विभिन्न औषधियोग से प्लीहा, कुष्ठ, गरविष तथा कामला रोगों को नष्ट करता है। यह पाचक, अग्निवर्धक तथा आमपाचन करता है। सम्पूर्ण प्रमेहों को नष्ट करता है। शरीर में कान्ति, बल-बुद्धि को बढ़ाता है। आमवात के प्रकोप को दूर करता है और ज्वरनाशक है ॥ १८-१९ ॥