रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextदशमस्तरङ्गः २२१ अत्र प्रयोग होने पर गुणतः साम्य होना आवश्यक है। चपल में प्रधान गुण—अतिवृष्य और शरीर को लौह सदृश करना है, सेलेनियम का प्रयोग निम्नावस्था में किया जाता है— पौरुष ग्रन्थि दाह में, नपुंसकता में, दुर्बलता में, अत्यन्त दाह में, वृद्धावस्था में, मन में श्रम होने पर, धातुक्षयजन्य दुर्बलता में, शयनावस्था में शुक्रस्राव होने पर, पौरुष ग्रन्थि से रसस्राव में, मैथुन के बाद मन में ग्लानि होने पर आन्तरिक मैथुन की इच्छा होने पर भी लिङ्ग की शैथिल्यावस्था में, अति स्त्री- प्रसङ्ग से मन में दुःख होने पर, शुक्र का पतलापन और विगन्ध होने पर, शिरः- शूल में, लिङ्ग की दुर्बलता में, मैथुन इच्छा मात्र से ही शुक्रस्राव होने पर, पेशाब के पहले या बाद में शुक्रस्राव होने पर, रतिक्रिया में असामर्थ्य पर ध्वज- भङ्ग होने पर, इन लक्षणों के होने पर जो औषधि अतिवृष्य और देहलौहसम करनेवाला न होगा तो कार्य क्या करेगा और चपल में यही प्रधान गुण है। अतः सेलेनियम ही चपल है—ऐसा मेरा निर्णय है। अथ अभ्रकविज्ञानीयो दशमस्तरङ्गः अभ्रकस्य नामानि अभ्रकं गगनं भृङ्गमभ्रं खं व्योमनामकम् । वज्रं घनञ्च गिरिजं बहुपत्रमनन्तकम् ॥ १ ॥ आकाशमम्बरं शुभ्रं त्वमलं गरजध्वजम् । मेघाख्यमन्तरिक्षञ्च तदेव परिकीर्तितम् ॥ २ ॥ अभ्रकनामानि—अभ्रकमित्यादिना ॥ १–२ ॥ भा.टी.—अभ्रक, गगन, भृंग, अभ्र, ख, व्योम, वज्र, घन, गिरिज, बहु- पत्र, अनन्तक, आकाश, अम्बर, शुभ्र, अमल, गरजध्वज, मेघ, अन्तरिक्ष, ये सब अभ्रक के नाम कहे जाते हैं ॥ १–२ ॥ अभ्रकस्य चातुर्विध्यम् अभ्रं सितारुणश्यामपीतवर्णविभेदतः । चतुर्विधं समाख्यातं कृष्णं तत्र गदापहम् ॥ ३ ॥ अभ्रभेदाः—"कृष्णं तत्र गदापहम्" इत्यनेन कृष्णस्यैव रोगप्रयोगयोग्यता सूचिता—दाक्षिणात्यास्तु श्वेताभ्रमपि पित्तज्वरादिषु योजयन्ति, तन्नु स्वल्पगु- णत्वात्प्राचीनाचार्यैः प्रायश उपेक्षितमासीदिति ज्ञेयम् ॥ ३ ॥