रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context२२४ रसतरङ्गिणी जात्याभ्रस्वरूपं यथा—निर्मोच्यपत्रं सुखेन विभागयोग्यपत्रसञ्चयम् ॥ १३ ॥ भा.टी.—नीले सुरमे के सदृश काला, चमकीला, वजनदार, पृथक् पृथक् होने योग्य पत्रोंवाला और कोमल, अभ्रक श्रेष्ठ समझना चाहिये ॥ १३ ॥ देशभेदेनाभ्रकस्य वैशिष्ट्यम् अभ्रकं हिमशैलोत्थमुत्तमं परिकीर्तितम् । मध्यमं पूर्वशैलोत्थं त्वधमं दक्षिणाद्रिजम् ॥१४॥ भा.टी.—हिमालय पर्वत की खान से प्राप्त होनेवाला अभ्रक उत्तम माना जाता है और पूर्वीय देशों के पर्वतों से प्राप्त मध्यम, दक्षिणी पर्वतों से प्राप्त अधम अर्थात् निषिद्ध होता है ॥ १४ ॥ अभ्रकखननविधिः गजप्रमाणं पुरुषप्रमाणं वा खानयेद्वै खनिमामयज्ञः । ततो गुणाढ्यं खलु भारपूर्णं समाहरेदभ्रकमञ्जनाभम् ॥१५॥ गजप्रमाणमिति-अविनष्टसत्त्वगगनग्रहणाय । तथाहूः-“राजहस्तादधस्ताद् यत् समानीतं घनं खनेः । भवेत्तदुक्तफलदं निःसत्त्वं निष्फलं परम् ॥” इति ॥ १५ ॥ भा.टी.—अभ्रक की खानों में गजप्रमाण नीचा या पुरुषप्रमाण साढ़े तीन हाथ या चार हाथ नीचा खोदकर उसमें से काले अञ्जन के सदृश चमकीला, काला और भारो मान का अभ्रक लेना चाहिये । इसी में अभ्रक के उत्तम गुण होते हैं ॥ १५ ॥ अशोधिताभ्रकस्य दोषाः बाधां विदध्याद्विविधां शरीरे हृत्पार्श्वपीडां तनुते नितान्तम् । शोफं क्षयं पाण्डुगदञ्च कुष्ठं त्वशोधिताभ्रं खलु मारितं यत् ॥१६॥ धान्याभ्रकरणे चैव मारणे सत्त्वपातने । रसतन्त्रविशेषज्ञः शुद्धमभ्रं नियोजयेत् ॥१७॥ अशोधिताभ्रकदोषाः—विविधां नानाप्रकाराम् । हितत्वात् धान्याभ्रकरणे मारणे सत्त्वपातने च शुद्धाभ्रविनियोगः ॥ १६-१७ ॥ भा.टी.—अशोधित अभ्रक या चन्द्रिकायुक्त अभ्रक सेवन करने से शरीर में अनेक प्रकार के रोग और पार्श्वपीडा, शोथ, पाण्डुरोग और कुष्ठ रोग उत्पन्न होते हैं । अतः अभ्रक की भस्म करने अथवा सत्वपातन करने या धान्याभ्रक के बनाने के लिये शुद्ध अभ्रक का ही प्रयोग करना चाहिये ॥ १६-१७ ॥