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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

Page 287 of 799

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Page 287

एकादशस्तरङ्गः २४५ पिण्डहरताल, चमकरहित, पत्रहीन और पिंड (डली) के रूप में होता है। इसमें से सत्त्व की मात्रा बहुत कम निकलती है ॥ ६ ॥ पत्रपिण्डतालयोर्वैशिष्ट्यम् पत्रतालं त्रिदोषघ्नं कुष्ठरोगहरं परम् । वातरक्तप्रशमनं परमेतद्रसायनम् ॥ ७ ॥ पिण्डतालं समाख्यातं भृशं स्त्रीपुष्पहारकम् । पत्रतालात्स्वल्पगुणं विशेषाद्धेयमेव तत् ॥ ८ ॥ परं अतिशयेनेति यावत् । पत्रपिण्डतालयोर्भेदः सत्त्वतारतम्यात् सहेतुकः । तत्र निःसत्त्वं पिण्डतालन्तु हेयमेवेति ॥ ७–८ ॥ भा.टी.–पत्रहरताल त्रिदोषप्रकोपनाशक, कुष्ठरोग तथा वातरक्त रोगनाशक और उत्तम रसायन है किन्तु पिंडहरताल प्रयोग करने पर स्त्री के मासिक स्राव को नष्ट करता है और पत्रहरताल की अपेक्षा इसमें बहुत ही स्वल्प-गुण होने से यह औषधिप्रयोग में नहीं लिया जाता है ॥ ७–८ ॥ कृत्रिमतालस्य निर्माणप्रकारः विशोधितं शङ्खविषं मरुत्सङ्ख्यकभागिकम् । तत्त्वभागिकमत्यच्छं गन्धकं विमलीकृतम् ॥ ९ ॥ खल्वे निक्षिप्य यत्नेन मेलयेत्तु शनैः शनैः । मिलितं तु ततो ज्ञात्वा विधानज्ञो भिषग्वरः ॥ १० ॥ पचेन्मन्दानलेनैतद् यन्त्रे डमरुकाभिधे । स्वांगशीते ततश्चोर्ध्वसंलग्नं तालकं हरेत् ॥ ११ ॥ विशुद्धमल्लगन्धाभ्यां तालकं यदि निर्मितम् । भिषग्वरस्तदा तालं नैवेह खलु शोधयेत् ॥ १२ ॥ शंखविषं श्वेतमल्लं ४९ भागिकम्, गन्धकं २४ भागिकम्। स्पष्टमन्यत् ।९-१२। भा.टी.–शुद्ध संखिया उनचास ४९ भाग, शुद्ध गन्धक चौबीस २४ भाग खरल में डालकर अच्छी तरह मर्दन करें और डमरूयन्त्र में डालकर बन्द करके पकावें । जब स्वांगशीत हो जाय तो सावधानी से यन्त्र को नीचे उतारकर ऊपर की हाँडी के भीतर जमे हुए हरताल को निकाल लें । यह कृत्रिम हरताल बनाने की विधि है । यदि शुद्ध संखिया और शुद्ध गन्धक से हरताल बनाया हुआ हो तो उसे शुद्ध करने की आवश्यकता नहीं रहती है ॥ ९–१२ ॥