रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextएकादशस्तरङ्गः २६३ अथ मनःशिलाया गुणाः मनःशिला कटुस्तिक्ता स्निग्धोष्णा लेखनी गुरुः । कासश्वासहरा कामं भूतोपद्रवनाशिनी ॥११५॥ अग्निमान्द्यक्षयानाहहन्त्री कण्डूतिनाशिनी । रसायनी ज्वरहरा वर्ण्या कामं विषापहा ॥११६॥ भूतोपद्रवा जीवाणुजाता व्याधयः । वर्ण्या वर्णप्रसादनी ॥११५-११६॥ भा.टी.—मैनसिल रस में कटु और तिक्त होती है। गुणों में स्निग्ध, उष्ण और गुरु होती है। यह लेखन (शोथ आदि में कफ को पतला कर निकालना) कार्य करती है। कास और श्वास रोगों में लाभदायक है, जीवाणुजन्य रोगों को नष्ट करती है। इसके अतिरिक्त अग्निमान्द्य, क्षय तथा अफरा, कब्ज और कण्डू को मिटाती है। यह नियमपूर्वक शुद्ध रूप में सेवन करने से हरताल की भाँति शरीर में रसायनकार्य करती है। पुराने ज्वरों और नवीन ज्वरों में लाभदायक, त्वचा के रोगों को नष्ट करके उसकी सुन्दरता को बढ़ाती है और विषनाशक है ॥११५-११६॥ विशुद्धमनःशिलाया मात्रा तत्त्वांशतो रक्तिकायाः कलांशप्रमितां तथा । शिला मात्रा विनिर्दिष्टा काशीनाथभिषक्तमैः ॥११७॥ अथास्या मात्रा—तत्त्वांशतो रक्तिकाया इति चतुर्विंशत्यंशत इति भावः । कलांशप्रमितां षोडशभागमिताम् ॥ ११७ ॥ भा.टी. - शुद्ध मैनसिल की मात्रा रत्ती के ३२ वें भाग से लेकर सोलहवें भाग तक रोगी के बलाबल को देखकर प्रयुक्त की जा सकती है ॥ ११७ ॥ अस्यामयिकः प्रयोगः वासकस्वरसोपेता त्र्यूषणक्षौद्रसंयुता । मनःशिला शीलिता तु कासं श्वासं व्यपोहति ॥११८॥ पिप्पलीमरिचोपेता धारिणाञ्जनयोगतः । नैपालिका तु नियतं नाशयेद्विषमज्वरान् ॥११९॥ वैदेहीनिम्बबीजोत्थचूर्णोपेता मनःशिला । कारवेल्लोर सैर्लीढा त्रिदोषज्वरहारिणी ॥१२०॥ सैन्धवमरिचमनोज्ञाशंखैः क्रमवृद्धभागसंमिश्रैः । अपनयतीह निकामं नेत्रगदान् विधिवदुपयुक्ता ॥१२१॥ रसाञ्जनान्विता शिला कपोतगूथसंयुता । शिला सुपेषिताञ्जनात्त्वपस्मृतिं विनाशयेत् ॥१२२॥