रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextभा.टी.—अशुद्ध मैनसिल सेवन करने से यदि शरीर में कोई उपद्रव हो जाय तो रोगी को तीन दिन तक दूध में शहद मिला कर पिलावें और पथ्य- पूर्वक रक्खे तो वमन, तृष्णा आदि उपद्रव शान्त हो जाते हैं ॥ १२५ ॥ मनःशिलाया निर्माणप्रकारः विशोधितं शंखविषं मरुद्भागमितं तथा । विशुद्धं गन्धपाषाणं कलाभागिकमाहरेत् ॥ १२६ ॥ खल्वे निक्षिप्य यत्नेन चूर्णयेद्विषजां वरः । चूर्णितञ्चाथ विज्ञाय यन्त्रे डमरुकाभिधे ॥ १२७ ॥ पचेत्ततः स्वतः शीते कुनटीमुर्ध्वगं हरेत् । प्रयोजयेद्विधानेन मात्रा सर्षपसंमिता ॥ १२८ ॥ अथ मनःशिलानिर्माणप्रकारः—शङ्खविषं गौरीपाषाणकं ४६ भागमितम्, गन्धकस्य १६ भागाः । मात्रा तु सर्पपमिता ॥ १२६–१२८॥ भा.टी.—शुद्ध संखिया उनचास भाग, शुद्ध गन्धक सोलह भाग, दोनों को खरल में एकत्र सूक्ष्मचूर्ण करके डमरूयन्त्र में डालकर पकायें । स्वांग- शीतल होने पर यन्त्र के ऊपर की हांडी के भीतर लगी हुई मैनसिल को निकाल कर प्रयोगों में काम लायें । इसकी मात्रा एक सरसों के बराबर समझनी चाहिये ॥ १२६–१२८ ॥ मनःशिलायाः सत्त्वपातनम् गुडगुग्गुलुकित्टाज्यैस्त्वष्टमांशेन वै पृथक् । शिला मूषागता कोष्ठ्यां ध्माता सत्त्वं विमुञ्चति ॥ १२६ ।' किट्टं मण्डूरम् ॥ १२६ ॥ भा.टी.—मैनसिल में गुड़, गूगल, लौहकिट्ट (मण्डूर) और घी, ये सब आठवां भाग डाल कर मूषा में रख कर कोष्ठी में तपाने से मैनसिल का सत्त्व निकल आता है ॥ १२६ ॥ अथ शंखविषस्य नामानि शंखमूषं शंखविषं गौरीपाषाणकं तथा । दारुमूषं दारुमृषा दारुमोचञ्च मल्लुकः ॥ १३० ॥ फेनाश्मभस्मसंज्ञश्च सोमलः सम्बलं तथा । आखुपाषाणकं चैव रसज्ञैः परिकीर्तितम् ॥ १३१ ॥ अथ शङ्खविषनामानि तन्त्रे व्यवहृतानि । फेनाश्मभस्मेति सुश्रुततन्त्रनिर्दिष्टं