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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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त्रयोदशस्तरङ्गः ३०१ भा.टी.-समुद्रफेन की उत्पत्ति के विषय में यह कहा जाता है कि समुद्र में एक मछली की जाति का प्राणी होता है जो दस हाथ लम्बा, गोल शरीर, क्षुद्र प्रकृति, विलक्षण प्रकार का होता है । इसकी आँखें भयानक होती हैं और पीठ कछुए की भाँति कठिन चर्म की बनी हुई होती है । जब यह प्राणी मर जाता है तो इसके पीठ की अस्थि सूख कर झाग की तरह दिखाई देने लगती है और यह अस्थि समुद्र की तरंगों से ताड़ित होकर धीरे-धीरे समुद्र के किनारे पर तैरने लगती है जैसे समुद्र की झाग । अतः इसे समुद्रफेन नाम से कहा जाता है ॥ १२४-१२६ ॥ यह शंख-आदिविज्ञानीय नामक द्वादशतरङ्ग समाप्त हुआ । —:०:— अथ क्षारत्रिकविज्ञानीयस्त्रयोदशस्तरङ्गः । अथ यवक्षारस्य नामानि यवक्षारो यवापत्यं यवजो यवशूकजः । यव्यो यवाग्रजश्चैव यवाह्वो यवनालजः ॥ १ ॥ यवशूको यावशूकः शूकजो यावशूकजः । याव्यस्तथैव पाक्यश्च समाख्यातो भिषग्वरैः ॥२॥ यवक्षारः समाख्यातो भिषग्वरैरिति तत्तद्ग्रन्थेषु एतन्नाम्ना व्यवहृतः ॥१,२॥ भा.टी.-यवक्षार, यवापत्य, यवज, यवशूकज, यव्य, यवाग्रज, यवाह्व, यवनालज, यवशूक, यावशूक, शूकज, यावशूकज, याव्य तथा पाक्य, ये सब नाम जवाखार के कहे जाते हैं ॥ १-२ ॥ यवक्षारस्य निर्माणप्रकारः यवशूकभवं भस्म समादाय भिषग्वरः । सलिलेऽष्टगुणे क्षिप्त्वा विमले भाजने ततः ॥३॥ सप्तवारं प्रयत्नेन स्रावयेत्पृथुवाससा । स्रावितं सलिलञ्चाथ चुल्ल्यां तीव्राग्निना पचेत् ॥४॥ निःशेषं सलिलं ज्ञात्वा पाकपात्रतलस्थितम् । यवक्षारं प्रयत्नेन गृह्णीयात्पाण्डुरप्रभम् ॥ ५ ॥ सप्तवारं स्रावणमत्यन्तनिर्मलतासम्पादनाय । अथवा सारकपत्रेण सकृदेव स्रावणं कर्तव्यम् ॥ ३-५ ॥ भा. टी.—जौ के पञ्चांग अथवा डंडी को जलाकर उसकी भस्म करलें ।

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