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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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Page 340

३१४ रसतरङ्गिणी निःशेषे सलिले तत्र स्थालिकातलसंस्थितम् । हिमकुन्देन्दुसङ्काशं सर्जिक्षारं समाहरेत् ॥ ४७ ॥ उष्ट्रप्रिया क्षुद्रदुरालभा, सा हि मरुप्रदेशे विशेषेण जायते । पञ्चनददेशे “लाना” इति नाम्ना प्रसिद्धा । “अन्या क्षुद्रदुरालम्भा मरुस्था मरुसम्भवा । विशारदाजभक्षा स्यादजादन्युष्ट्रभक्षिका ।” इति राजनिघण्टुः ॥ ४५–४७ ॥ भा.टी.—उष्ट्रप्रिया (छोटी दुरालभा) पञ्चांग को लेकर धूप में सुखाकर इसकी सफेद (राख) बना लें । एक स्वच्छ बड़े पात्र में इस राख को डाल कर उसमें राख से आठ गुना जल डाल कर अच्छी तरह मसलें और एक मोटे गाढ़े वस्त्र से इसको सात बार छान लें । अब छने हुए जल को एक साफ कढ़ाई में डाल कर जल भाग उड़ने तक पकायें । जलीयांश उड़ने पर पात्र के तल में स्वच्छ तथा सफेदवर्ण का सज्जीखार रह जायगा । इससे खुरच कर निकाल लें ॥ ४५–४७ ॥ सर्जिक्षारस्य गुणाः सर्जिक्षारः स्मृतस्तीक्ष्णः कटुरुष्णश्च पाचनः । समीरणहरः कामं कासश्वासनिवारणः ॥ ४८ ॥ अग्निदीप्तिकरश्चैव गुल्माध्मानविनाशनः । व्रणोदरामयहरः कृमिघ्नश्च प्रकीर्तितः ॥ ४९ ॥ भा.टी.—सज्जीखार तीक्ष्ण, कटु, उष्ण, पाचन, वायुप्रकोप (आध्मानादि) नाशक तथा श्वास-कास-शामक है । इसके प्रयोग से क्षुधा बढ़ने लगती है, गुल्म तथा आध्मान रोग नष्ट होते हैं । बाह्य प्रयोग में व्रणों के लिये लाभ- दायक होता है और उदर रोग तथा कृमिनाशक होता है ॥ ४८–४९ ॥ सर्जिक्षारस्य मात्रा आरभ्य रक्तित्रितयाद् रविरक्तिकसंमितम् । सर्जिक्षारं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ ५० ॥ मात्रास्य द्वादशगुञ्जापर्य्यन्तम् ॥ ५० ॥ भा.टी.—सज्ज़ीखार को तीन रत्ती से लेकर बारह रत्ती तक की मात्रा में रोगी और रोग का बल, देश, काल आदि देख कर प्रयुक्त किया जा सकता है ॥ ५० ॥ सर्जिक्षारस्य आमयिकः प्रयोगः कणोजरणचूर्णेन सज्जिका परिशीलिता । रक्तित्रयमितात्यर्थं दीपनी पाचनी मता ॥ ५१ ॥