रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextत्रयोदशस्तरङ्गः ३१७ भा.टी.—निम्बूकाम्लीय सर्जिका की मात्रा बालकों के लिये एक रत्ती से लेकर दो रत्ती तक प्रयुक्त की जा सकती है। पाँच रत्ती से लेकर दस रत्ती तक निम्बूकाम्लीयसर्जिका की पूर्ण मात्रा समझनी चाहिये। इसको भिन्न-भिन्न रोगों में निम्बूकाम्ल या निम्बूस्वरस के सदृश ही प्रयोग करना चाहिये ॥ ६४, ६५ ॥ अस्या आमयिकः प्रयोगः रक्तिद्वयमितेयं तु निम्बूकाम्लीयसर्जिका । पलद्वयमितेनेह गव्यदुग्धेन योजिता ॥ ६६ ॥ निपीता प्रत्यहं त्वेवं निम्बूकाम्लीयसर्जिका । क्षीरच्छर्दिहरा चैव वह्निमान्द्यापहा मता ॥ ६७ ॥ आध्मानक्षोभशमनो अतीसारोदरापहा । कान्तिप्रदा विशेषेण देहपुष्टिकरी मता ॥ ६८ ॥ कृशानां मातृहीनानां शिशूनामत्यजीर्णिनाम् । क्षीरं छर्दयताञ्चैतद् विशेषात्परमौषधम् ॥ ६९ ॥ निर्दिष्टमात्रयैवेह निम्बूकाम्लीयसर्जिकां । शिशुभ्यः क्षीरपायिभ्यः प्रयुञ्जीत भिषग्वरः ॥ ७० ॥ दुग्धपानभवेऽजीर्णे यूनां वर्षीयसामपि । रसवैद्यैः प्रशस्तेयं निम्बूकाम्लीयसर्जिका ॥ ७१ ॥ रोगेषु प्रयोगप्रकारश्च सुगमप्रायः, अपि च दुग्धाजीर्णे सति युवानो वृद्धा- श्चाप्येनां व्यवहरेयुः ॥ स्पष्टमन्यत् ॥ ६६-७१ ॥ भा.टी.—निम्बूकाम्लीय सर्जिका को दो रत्ती मात्रा में लेकर दो पल दूध में मिलाकर प्रतिदिन पिलाने से दुग्धपाक न होने से होनेवाली वमन को दूर करके अग्निमान्द्य में भी आराम आता है। उदराध्मान तथा क्षोभ (Irrita- tion) को शान्त करती है। अतीसार तथा उदर रोगहर है। इसके कुछ काल प्रयोग करने से दूध पाक न कर सकनेवाले रोगियों को दूध पचने लगता है जिससे उनके शरीर की अग्नि बढ़कर पुष्टि होने लगती है। अतः यह औषधि माताहीन दुबले-पतले अजीर्ण रोगग्रस्त तथा दूध की वमन करनेवाले छोटे बच्चों के लिये अत्युत्तम होती है। दूध पीनेवाले बच्चों को निम्बूकाम्लीय- सर्जिका पूर्वनिर्दिष्ट मात्रा के आधार पर ही देनी चाहिये। यदि युवा अथवा वृद्धों को भी दूध नहीं पचता हो तो उन्हें भी इसके सेवन से दूध पचने लगता है ॥ ६६-७१ ॥