रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context२१ त्रयोदशस्तरङ्गः ३२१ आदि पारदविकारों में सुहागे को चौबीस गुने जल में घोल कर इसके कुल्ला करने से आराम आता है। दाँतों के मसूड़ों में क्षत, शोथ, पायरिया होने पर उनमें सुहागे को बोलचूर्ण के साथ पीसकर धीरे-धीरे मसूड़ों में मलना चाहिये। गले की आवाज बन्द होने पर सुहागे के टुकड़ों को मुख में रख कर धीरे-धीरे इसका रस चूसा जाता है। तीव्र उदराध्मान में सुहागा और त्रिकटु चूर्ण को मधु में मिला कर चटाया जाता है। स्नायुकमय (नेहरूवा) में सुहागा, हींग और यवाखार को एकत्र मिला कर प्रातः सायंकाल एक सप्ताह तक सेवन करने से शीघ्र आराम आता है। मांस आदि गुरु द्रव्यों को पचाने के लिये सुहागे को लौंग, सोंठ, काली मिर्च अपामार्गक्षार के साथ मिला कर सेवन कराया जाता है। सुहागे को सूक्ष्म चूर्ण करके यदि व्रणों पर छिड़का जावे तो इससे शीघ्र ही उनका रक्तस्राव बन्द हो जाता है। मुखपाक में सुहागे की लावा को मधु में मिला कर मुख के भीतर लेप करने से दाहशोथादि युक्त मुखपाक शांत हो जाता है। योनि में क्षत, पिंडिका, व्रण आदि होने पर उनको टंकणजल से धोने पर या बस्ति देने पर आराम आता है। व्रणों को भरने के लिये टंकण में समभाग पुराना शुष्क गुड़ मिला कर छिड़कने से वे भर जाते हैं। सिध्मरोग में सुहागे की खील में सफेद चन्दन मिला इसका जल के साथ लेप करने से शीघ्र आराम आता है। अति तीव्र प्रकार की वमन को रोकने के लिये टंकण को मकोयस्वरस के साथ प्रयोग करने से आराम आता है ॥८२-६५॥ टङ्कणामृतमलहर सुपुष्पितं टङ्कणं तु तोलकद्वयसंमितम् । सिक्थतैलं च विमलं भानुतोलकसंमितम् ॥ ६६ ॥ तोलकार्द्धमिता चैव सर्जिका विमलीकृता । विशुद्धं पुष्पकाशीसं सर्जिकासमभागिकम् ॥ ६७ ॥ माषद्वयमितः क्षारः पिप्पलत्वक्समुत्थितः । सर्वं सम्मेल्य यत्नेन काचकूप्यां निधापयेत् ॥ ६८ ॥ मतो मलहरोऽयं तु टङ्कणामृतसंज्ञकः । प्रशस्यते विशेषेण दुष्टव्रणविशोधने ॥ ६६ ॥ टङ्कणामृतमलहरे भानुतोलकसंमितमिति द्वादशतोलकम् । सिक्थतैलं विना जलेन कठिनपक्वव्रणोपरि रेखाकारं लिप्तं तं दारयति ॥ ६६-६६ ॥ भा.टी.—सुहागे की लावा दो तोला, साफ सिक्थतैल बारह तोला, सजी-