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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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त्रयोदशस्तरङ्गः ३२३ ठंडा करके ऊपर के जल को अलग कर दें । इस प्रकार पात्र के जल में जमे हुए टंकणाम्ल को लेकर धूप में सुखा कर काम में लावें ॥१०१-१०५॥ अस्य गुणाः टङ्कणाम्लस्तु भूतघ्नो नेत्राभिष्यन्दनाशनः । अग्निदग्धव्रणहरो मूत्रलः क्षतरोपणः ॥१०६॥ औपसर्गिकमेहोत्थव्रणबाधानिबर्हणः । श्वेतासृग्दरहृच्चैव श्रुतिस्रावहरो मतः ॥१०७॥ भूतघ्नः जीवाणुनाशकः श्रुतिस्रावः कर्णे जायमानस्रावः ॥१०६-१०७॥ भा. टी.—उक्त प्रकार से प्राप्त टंकणाम्ल जीवाणुनाशक, नेत्राभिष्यन्द ( नेत्र दुखना )–हर, अग्निदग्धव्रणहर, मूत्र अधिक लानेवाला तथा क्षतों को भरनेवाला होता है । सुजाक में मूत्रेन्द्रिय के अन्दर होनेवाले व्रण के कष्टों को दूर करता है। श्वेतप्रदर में लाभ करता है। कान बहने को बन्द करता है ॥१०६-१०७॥ टङ्कणाम्लस्य मात्रा आरभ्य रक्तिद्वितयाद्रक्तिकाष्टकसंमितम् । टङ्कणाम्लं प्रयुञ्जीत बलकालाद्यपेक्षया ॥ १०८ ॥ टङ्कणाम्लस्य आमयिकः प्रयोगः त्रिगुञ्जष्टङ्कणाम्लस्तु वारिणा परिशोलितः । पूतिगन्धयुतं मूत्रस्रावं नाशयति द्रुतम् ॥ १०६ ॥ टङ्कणाम्लो गुञ्जमितो मधुनाऽष्टगुणेन तु । माषोन्मितेन धौतेन नवनीतेन योजितम् ॥ ११० ॥ स्तनक्षतं निहन्त्याशु तथा कर्णविचर्चिकाम् । अग्निदग्धव्रणञ्चैव विविधानि व्रणानि च ॥ १११ ॥ अस्य मात्रानिर्देशो भक्षणार्थम् ॥१०८-१११॥ भा. टी.—रोग और रोगी का बल तथा काल आदि का विचार करके टंकणाम्ल को दो रत्ती से लेकर आठ रत्ती की मात्रा तक प्रयोग कर सकते हैं। दुर्गन्धयुक्त मूत्रस्राव होने पर मूत्र दुर्गन्धि को नष्ट करने के लिए तीन रत्ती टंकणाम्ल को जल के साथ दिया जाता है। एक रत्ती टंकणाम्ल को आठ रत्ती शहद और एक मासे धुले हुए मक्खन में मिलाकर मरहम बना लें। यह मरहम स्तन के क्षत, कान के चारों तरफ होनेवाली स्रावयुक्त फुन्सियों