रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in contextचतुर्दशस्तरङ्गः ३२६ सेवन कराया जाता है। यकृत् में शोथ अथवा संकोच के कारण उत्पन्न होने- वाले जलोदर (Ascites) में नौसादर को अपामार्गकषाय अनुपान से सेवन कराना चाहिये। निमोनिया, कास आदि से फेफड़ों से होनेवाले रक्तस्राव को रोकने के लिये एक या दो रत्ती नौसादर को काञ्जी के साथ पिलाने से वह शीघ्र बन्द हो जाता है। एक तोला नौसादर को दस तोला शीतल जल में घोलकर इसमें कपड़े को तर करके ज्वर, शूल, पीड़ा, स्तब्धता युक्त ब्रध्न शोथ में बाँधने या लपेटने से सात दिन में ब्रध्नशोथ शान्त हो जाता है। सुजाक में मूत्रेन्द्रिय के भीतर व्रण होने या भीतर से पूय निकलने पर नौसादर तीन रत्ती जवाखार में मिलाकर इसको शारिवा-(अनन्तमूल) कषाय के साथ पिलाने से शीघ्र ही आराम आता है ॥ ६-१६ ॥ वक्तव्य—नौसादर या अमोनिया शरीर में से मल को श्वास, श्लेष्म और मूत्र के द्वारा बाहर निकालता है। अतः फुस्फुस, गला तथा वृक्क रोगों में इसका प्रयोग अधिक लाभकारी होता है। नवसादरस्य सत्त्वपातनम् विमलं कठिनिचूर्णं तोलकत्रितयोन्मितम् । विशुद्धं नवसारञ्च चतुस्तोलकसंमितम् ॥ २० ॥ खल्वे सम्पेष्य यन्त्रे तु पचेड्डमरुकाभिधे । नृसारसत्त्वं विशदमूर्ध्वलग्नं समाहरेत् ॥ २१ ॥ नवसादरसत्त्वपातनम्—कठिनी गौरखटी, विशदं निर्मलम् ॥ २०, २१ ॥ आ.टी.—शुद्ध खड़िया ( खटिक ) चूर्ण तीन तोला और नौसादर चार तोला लेकर दोनों को एकत्र खरल में अच्छी तरह पीसकर डमरूयन्त्र में भरकर पकाने से नौसादर का सत्त्व (Ammonia) ऊपर की हाँडी में लगा हुआ मिलता है। इसे निकालकर एक शीशी में अच्छी तरह डाट लगाकर रख लें ॥२०,२१॥ अस्य गुणाः नृसारसत्त्वं रुचिदं त्वम्लपित्तहरं परम् । कफविश्लेषणकरं हृद्दौर्बल्यविनाशनम् ॥ २२ ॥ वामकं सारकञ्चापि तथा फुप्फुसशोथहृत् । पाचनं दीपनञ्चैव घ्रातं मूर्च्छाहरं मतम् ॥ २३ ॥ आ.टी.—नौसादरसत्त्व अन्तःप्रयोग में रुचिवर्धक, अम्लपित्तहर है। इसके प्रयोग से कफ पतला होकर निकलता है और हृदय की दुर्बलता दूर होती है।