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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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३३४ रसतरङ्गिणी रविमूलस्य चूर्णेन तण्डुलक्वथितेन वा । निपीतः सोरकः काममामवातं विनाशयेत् ॥ ४० ॥ विडाजमोदमिशिकाधात्रीचूर्णेन सोरकः । भक्षितो निम्बुनीरेण विदग्धाजीर्णकं जयेत् ॥ ४१ ॥ सोरकं द्रावयेत्तोये तेन सिञ्चेत्तु कर्गदम् । तद्धूमपानयोगेन श्वासस्त्व्राशु विनश्यति ॥ ४२ ॥ सुरानृसारकोपेतं सोरकं द्रावयेद् जले । तत्सिक्तवस्त्रं शीर्षस्थं प्रलापं ज्वरजं जयेत् ॥ ४३ ॥ ससितं सोरकं वारा गुञ्जापञ्चकसंमितम् । ज्वरदाहृतृषातैंस्तु रोगिभिः परिशीलितम् ॥ ४४ ॥ जनयेत्स्वेदमत्यर्थं मूत्ररोधञ्च नाशयेत् । दाहतृषादिकञ्चापि हत्वा कामं ज्वरं जयेत् ॥ ४५ ॥ सोरकं वटपर्णाञ्च संपिष्टन्तु शिलातले । बस्तिप्रदेशे लेपेन मूत्ररोधं विनाशयेत् ॥ ४६ ॥ कर्गदमिति मसीशोषणोपयुज्यमानं शुभ्रं कागदमित्यर्थः । स्पष्टमन्यत् ॥ ३८-४६ ॥ भा.टी.—भयंकर मूत्रकृच्छ्र और अश्मरी में सोरक को गोखुरु के क्वाथ के साथ सेवन करने से उक्त रोगों में मूत्र खुल कर आता है और अश्मरी गल कर निकलने लगती है । सोरे को फिटकरी-के साथ मिला कर जल अथवा अर्क सौंफ के साथ सेवन करने से आध्मान और मूत्रकृच्छ्र में आराम आता है । आमवात ( गठिया ) रोग में सोरे को आक की जड़ के चूर्ण के साथ अथवा चौलाई के क्वाथ के साथ प्रयोग करने से शीघ्र आराम आता है । विडलवण, अजमोद, सौंफ और आंवला चूर्ण के साथ निम्बूस्वरस अनुपान से सेवन करने पर विदग्धाजीर्ण नष्ट हो जाता है । सोरे को जल में घोल कर सान्द्र घोल बना लें, अब इससे कागज ( Blotting Paper ) को भिगोकर सुखा लें । अब इसकी सिगरेट बना कर इसका धूम्रपान करने से श्वास का दौरा शान्त होता है । शीर्षसांयुग्मज्वर या शीर्षावरण शोथज्वर ( Cerebro spinol fever or Meningilis ) में होनेवाले प्रलाप में सोरे और नौसादर के चूर्ण को सुरा में घोल कर इस द्रव में बारीक कपड़े को तर करके रोगी के सिर में रखने से प्रलाप शान्त हो जाता है । जब ज्वर में रोगी को अत्यन्त दाह और