रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context।३४०। रसतरङ्गिणी अपामार्गक्षारचूर्णैर्यवाग्रजसमन्वितम् । शीलितं नाशयेदाशु मूत्रकृच्छ्रं तथाश्मरीम् ॥ ७२ ॥ खरमञ्जरिकाक्षारः सव्योषश्च ससैन्धवः । शीलितो नाशयेद् गुल्मं प्लीहानञ्चातिदारुणम् ॥ ७३ ॥ अपामार्गक्षारः क्षारसामान्यपरिभाषया निर्मितः । मयूरोऽपामार्गः खरमञ्ज- रिका किणिरिति पर्यायाः । सतालः हरितालयुक्तः । सशिलं मनःशिलायुक्तम् । यवाग्रजो यवक्षारः ॥ ६७–७३ ॥ भा.टी.—अपामार्गक्षार को उचित मात्रा में लेकर मधु के साथ कुछ दिन सेवन करने से भयंकर श्वास रोग में आराम आता है । अपामार्गक्षार का कल्क एक पाव, तिलतैल एक सेर और जल चार सेर, इन सब को एकत्र कर तैलपाक विधि से तैल तैयार करके कान में कुछ दिन लगातार प्रयोग से ( डालने से ) बहरापन दूर हो जाता है । अपामार्गक्षार में सोंठ, मिर्च, पीपल तथा अजवाइन का समभाग चूर्ण मिला गरम जल से सेवन करने पर शीघ्र ही उदर का शूल तथा भयंकर आध्मान रोग में आराम आता है। पुराने लिंगार्श को काटने या गलाने के लिये अपामार्गक्षार में समभाग हरताल मिला कर जल से लिंगार्श पर लेप करने से वे सब कट जाते हैं । सफेद कोढ़ में अपामा- र्गक्षारचूर्ण को समभाग मैनसिल में मिला गोमूत्र से लेप करने से वह कुछ दिनों में अच्छा हो जाता है । मूत्रकृच्छ्र तथा अश्मरी में अपामार्गक्षार को जवा- खार में मिलाकर शीतल जल से सेवन किया जाता है । अपामार्गक्षार को सोंठ, मिर्च, पीपल तथा सैन्धानमकचूर्ण में मिलाकर उचित अनुपान से प्रयोग करने पर भयंकर गुल्म तथा प्लीहा रोग में आराम आता है ॥ ६७-७३ ॥ अथ अर्कक्षारस्य नामानि अर्कक्षारो रविक्षारो भास्करक्षारकस्तथा । खज्जूर्घ्नक्षारकश्चाथ मित्रक्षारश्च कीर्तितः ॥७४॥ अर्कक्षार, रविक्षार, भास्करक्षारक, खज्जूर्घ्न और मित्रक्षार, ये सब नाम अर्क ( आक, मदार ) क्षार के कहे जाते हैं ॥ ७४ ॥ अर्कक्षारस्य गुणाः अर्कक्षारः स्मृतस्तीक्ष्णो गुल्मप्लीहादिनाशनः । पाचनो दीपनश्चापि कासश्वासप्रणाशनः ॥७५॥