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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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चतुर्दशस्तरङ्गः ३५७ रुद्रभागमितञ्चात्र गन्धकद्रावकं शुभम् । शनैः शनैस्तु निक्षिप्य चुल्लिकायां निधापयेत् ॥ १६८ ॥ ततोऽस्यां काचनलिकामुखमेकं निवेशयेत् । अपरञ्च मुखं तस्यास्तोयपूर्णोदराऽर्द्धके ॥ १६६ ॥ नीरपूरितपात्रस्थे काचकुम्भेऽपरे न्यसेत् । अतिमन्दानलेनाथ पचेत्खलु विधानवित् ॥ १७० ॥ तिर्यङ्निपातितं चाथ बाष्परूपेण सञ्चितम् । तोयाभं लवणद्रावं रसवैद्यः समाहरेत् ॥ १७१ ॥ अथ लवणद्रावको नवीनैः परिभाषितः—भृष्टचूर्णितसैन्धवस्य ६ भागाः, गन्धकद्रावकस्य ११ भागाः ॥ १६६–१७१ ॥ भा.टी.-एक स्वच्छ पात्र में सैन्धानमक के सूक्ष्मचूर्ण को अच्छी तरह भूनें, जब भुनने पर उसका जलीयांश सूख जाय तो पात्र को चूल्हे से नीचे उतार लें। अब इस भुने हुए सैन्धानमक चूर्ण में से छः भाग चूर्ण लेकर कांच की शीशी में डालें और इसी में धीरे-धीरे ग्यारह भाग गन्धकद्राव भी डालकर मिला दें । अब इस सैन्धानमकवाली शीशी को सुराप्रदीप अथवा चूल्हे के ऊपर रखकर इस शीशी के मुख पर एक तिरछी कांच की नली जोड़ दें और नली का दूसरा मुख एक दूसरी अर्धनलपूरित और शीतल जलयुक्त पात्र के बीच में रखी हुई शीशी के मुख से जोड़ दें । यह शीशी सैन्धानमक वाली शीशी से बड़ी होनी चाहिये । अब सैन्धवचूर्णवाली हांडी के नीचे मन्द-मन्द अग्निताप देकर पकायें । इस प्रकार लवणद्राव वाष्प रूप से तिरछा उड़कर जलवाली शीशी में जल में मिला हुआ प्राप्त होगा। जल के अभाव में इसका प्रयोग होता है ॥ १६६-१७१ ॥ वक्तव्य—लवणद्राव (Hydrochloric acid) सांद्र (Strong) और तरल (Light) भेद से दो प्रकार का होता है। इनमें से आगे कहे जाने- वाले सजललवणद्रावक को तरल या हल्का लवणद्राव कहा जाता है । किन्तु यदि एक भाग जल में ४५० भाग लवणद्राव के वाष्प संचित किये गये हों तो उसे सान्द्र लवणद्रावक कहते हैं । सजललवणद्रावकस्य निर्माणप्रकारः अनलनयनवर्त्म-प्राप्तसङ्ख्याप्रमाणं सलिलममलमादौ काचपात्रे निदध्यात् ।