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रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)

Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary

by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)

DevanagariHindipublished799 pages

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पञ्चदशस्तरङ्गः ३६७ काँच के पात्र में रखकर इस पत्र को त्रिपादिका पर रख कर इसके नीचे सुरा- दीपक जलायें और पात्र में थोड़ा-थोड़ा करके लवणद्राव और लवङ्गद्राव से चतुर्थांश सोरकद्राव तब तक डालें जब तक सम्पूर्ण स्वर्ण गल न जाय। स्वर्ण के अच्छी तरह गल जाने के बाद फिर इसको और पकायें जिनसे द्राव की अधिकता कम हो जाय। अब इसी पात्र में थोड़ा जल डालकर पकायें। इसके अनन्तर इसी में थोड़ा-थोड़ा करके सजल चणकाम्ल ( Oxalic acid ) तब तक डालें जब तक स्वर्ण के अतिसूक्ष्म कण काँच पात्र के तल में बैठ जायें। अब इसको अग्नि से पृथक् करके स्वर्ण-कणों को सावधानी के साथ जल से तब तक धोयें जब तक कि उनमें अम्लता न रहे। अन्त में इन कणों को सुखा कर रख लें, यह शुद्ध स्वर्ण कहा जाता है ॥ २०-२६ ॥ विशुद्धस्वर्णस्य प्रयोगक्रमः विशोधितं सुवर्णन्तु रसतन्त्रविचक्षणः। घृष्ट्वा च मण्डलीकृत्य तत्र तत्र प्रयोजयेत् ॥ २७ ॥ विशोधितस्य सुवर्णस्य शिलादौ घृष्ट्वा मण्डलीकृत्यातिसूक्ष्मपत्ररूपेण च ॥२७॥ भा.टी.-उक्त विधियों से अच्छी तरह शुद्धस्वर्ण को घिसकर अथवा इसके वर्क बना कर आवश्यकतानुसार प्रयोग में लाया जा सकता है ॥ २७ ॥ घृष्टस्य विशुद्धस्वर्णस्य गुणाः विशुद्धं कनकं घृष्टं विषबाधविनाशनम् । मधुरं शीतलं नेत्र्यं गर्भस्थापनमुत्तमम् ॥ २८ ॥ पित्तामयप्रशमनं हृद्दौर्बल्यहरं परम् । अन्यभेषजसाहाय्यात् करोति विविधान् गुणान् ॥२६॥ घृष्टस्य अपक्वस्यैव शुद्धस्य केवलं सुवर्णस्य सेवने गुणाः—विषबाधाहरं विशेषतः, तथा शीतञ्च वीर्यतः स्पर्शतश्च, हृदयदौर्बल्यहरञ्च ॥ २८, २६ ॥ भा.टी.—शुद्धस्वर्ण को घिसकर सेवन करने से शरीरगत अनेक प्रकार के विषप्रभाव नष्ट हो जाते हैं। यह मधुररस शीतवीर्य, नेत्रों के लिये लाभदायक, गर्भाशय की गर्भधारण शक्ति को बढ़ानेवाला है। पित्त-प्रकोपजन्य दाह आदि रोगों को शान्त करता है। स्वर्ण हृदय की दुर्बलता को हटाने में सर्वोत्तम औषधि है। स्वर्ण को अन्यान्य औषधियों में मिलाकर प्रयोग से अनेकविध लाभ हो सकते हैं ॥ २८-२६ ॥ सुवर्णमण्डलस्य नामानि सुवर्णमण्डलं स्वर्णमण्डलं स्वर्णपत्रकम् । सुवर्णपटलं स्वर्णदलञ्चापि प्रकीर्तितम् ॥ ३० ॥