रसतरङ्गिणी (सदानन्द शर्मा - पारद, धातु, उपधातु एवं भस्म रसायन शास्त्र सटीक)
Rasatarangini of Sadananda Sharma with Prasadani Commentary
by सदानन्द शर्मा (टीकाकार: पं. हरिदत्त शास्त्री)
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Read in context३८० रसतरङ्गिणी रस में एक दिन तक अच्छी तरह से घोटकर जल से धोकर साफ कर लें। फिर इस पीठी में दो कर्ष परिमाण शुद्ध गन्धक और एक कर्ष शुद्ध हरताल मिलाकर अच्छी तरह घोटकर चूर्ण करलें। अन्त में इस चूर्णको शरावसम्पुट में रखकर लघुपुट में फूंक दें। इस तरह तीन लघुपुटों में फूँकने से चाँदी की भस्म हो जाती है। इस प्रकार बनी हुई रजतभस्म लाल कमलसदृश सुन्दरवर्ण की होती है ॥ १७-२१ ॥ द्वितीयो मारणप्रकारः रौप्यपत्राणि शुद्धानि समादाय भिषग्वरः । कर्तर्या कर्तयेच्चाथ कणान् सूक्ष्मांस्तु कारयेत् ॥ २२ ॥ रौप्यपत्रमितञ्चाथ तालं गन्धञ्च शोधितम् । निक्षिपेच्चाथ सम्पेष्य शरावद्वयसम्पुटे ॥ २३ ॥ निधाय पुटयेद्यत्नात्पुटे कुक्कुटसंज्ञके । एवं पुटत्रयेणैव तारं यात्याशु पञ्चताम् ॥ २४ ॥ भस्म सञ्जायते चैवं कालाञ्जनसमप्रभम् । एवं मृतं चन्द्रलोहं वीतशङ्कः प्रयोजयेत् ॥ २५ ॥ द्वितीयः प्रकारः सुगमः ॥ २२-२५ ॥ भा.टी.-शुद्ध चाँदी के पात्रों को लेकर उनको कैंची से काटकर छोटे- छोटे टुकड़े कर लें। अब रजत के टुकड़ों में चाँदी के बराबर शुद्ध हरताल और शुद्धगन्धक मिलाकर दो छोटे-छोटे सिकोरों में बन्द करके कुक्कुटपुट में फूंक दें। इस प्रकार हरताल और गन्धक के योग से तीन कुक्कुटपुट देने से रजत की भस्म हो जाती है। परन्तु यह भस्म काले सुरमे के सदृश काली चमकीली होती है। इसे निःशंक होकर कार्य में ला सकते हैं ॥ २२-२५ ॥ तृतीयो मारणप्रकारः पत्तलीकृतपत्राणि राजतानि समाहरेत् । कर्तर्या कर्तयित्वा च कणान सूक्ष्मांस्तु कारयेत् ॥ २६ ॥ तारपत्रसमं सूतं गन्धञ्च विमलं हरेत् । कुमारीस्वरसं दत्त्वा सम्यक् सम्पेषयेद् बुधः ॥ २७ ॥ शरावसम्पुटे न्यस्य करीषाग्नौ पुटेद्भिषक् । एवं स्वल्पपुटैरेव रौप्यं याति हि पञ्चताम् ॥ २८ ॥